ब्रांड का बाजार में सिसकते सामाजिक सरोकार

ब्रांड का बाजार में सिसकते सामाजिक सरोकार

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साक्षी त्रिपाठी।।
हमारे सितारे विज्ञापनों में भी भरपूर काम करते हैं। लेकिन ब्रांड के इस बाजार में सामाजिक जिम्मेदारी के मुकाबले कमाई की हैसियत बहुत ज्यादा हो गई है। यही कारण है कि जिन सितारों को लोगों ने अपने दिलों में जगह दी, उनमें से बहुत कम है, जो अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को कमाई से ज्यादा तवज्जो देते हैं। 
हमारे सितारे असल में तो फिल्मों में काम करते हैं, लेकिन विज्ञापनों में काम करना भी उनकी कमाई की जरूरतों के साथ साथ उनके स्टेटस से जुड़ा माना जाता है। जिसके पास जितने ज्यादा विज्ञापन, वह उतना ही ज्यादा सफल। दरअसल, विज्ञापनों की तासीर यह है कि सितारों की वजह से ब्रांड को जितनी चमक मिलती है, उस ब्रांड के साथ सितारों की चमक भी उतनी ही बढ़ती है। कुल मिलाकर मामला चमक का है। विज्ञापनों में दोनों चमकते हैं। ब्रांड भी और उसका ब्रांड एंबेसडर भी। लेकिन विज्ञापन स्वीकार करते समय क्या हमारे सितारे अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों के बारे में भी सोचते हैं। अगर यह सवाल पूछा जाए, तो बहुत सारे सितारे चुप रहना ज्यादा पसंद करते हैं।
ब्रांड और ब्रांड एंबेसडर की दुनिया में अमिताभ बच्चन आज भी शहंशाह हैं। अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा के संसार का वो नाम हैं जिसके सामने सारे नाम बहुत छोटे हैं। वे सबसे बड़े और सबसे चमकदार सितारे के रूप में हमारे दिलों में बैठे हैं। लेकिन आज उनको देश और दुनिया के हर घर में पहचान दिलाने और सिनेमा के साथ साथ विज्ञापनों का भी बहुत बड़ा हाथ है। अमिताभ बच्चन का नाम जिस ब्रांड के साथ जुड़ा, उसको सफलता का आसमान जूमने में देर नहीं लगी।  पिछले कुछ सालों की बात करें, तो पारकर पेन, डेरी मिल्क, नेस्ले मैगी, इमामी बोरोप्लस, बिनानी सीमेंट, नवरत्न तेल, आईसीआईसीआई बैंक, टाटा तनिष्क ज्वेलरी, कल्याण ज्वेलर्स और डाबर च्यवनप्राश, लोढ़ा पलावा, जैसे बहुत सारे ब्रांड हैं, जिनके जरिए अमिताभ को नाम मिला, पैसा मिला और उन ब्रांड को भी बाजार मिला। अमिताभ बच्चन अब जीवन के उस मुकाम पर हैं, जहां भले ही कोई फिल्म हिट हो या फ्लॉप, लेकिन उस फिल्म में उनका अभिनय करना ही उस फिल्म की इमेज को बढ़ाने का मजबूत काम करता है। अब ब्रांड अमिताभ बच्चन एक रिस्क-फ्री इन्वेस्टमेंट की तरह हैं। लेकिन अमिताभ बच्चन कुछ साल पहले तक पेप्सी का विज्ञापन करते थे। लेकिन 8 साल तक इसका प्रचार करने के बाद उन्होंने उससे अपने को अलग कर लिया। अमिताब भच्चन ने इसका कारण बताते हुए आईआईएम-अहमदाबाद में कहा था कि उनको एक बार एक छोटी बच्ची मिली। उसने उनसे सवाल किया कि वे पेप्सी का विज्ञापन क्यों करते है। जबकि उसमें तो जहर होता है। पेप्सी में जहर होने की बात उस बच्ची को उसकी टीचर ने बताई थी। इसी समारोह में अमिताभ बच्चन ने यह भी कहा कि बच्ची के इस सवाल के कुछ वक्त बाद ही उन्होंने अपने आपको पेप्सी से अलग कर लिया था।  लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही उछला कि जिस पेप्सी का अमिताभ बच्चन करीब आठ साल तक प्रचार करते रहे, उसको जहर बताने जैसी बात क्या उन्हें करनी चाहिए थी।
स्वामी रामदेव तो खैर अपनी कंपनी पतंजली के लगभग ज्यादातर उत्पाद का विज्ञापन खुद ही करते हैं, लेकिन यहां अब सवाल सिर्फ अमिताभ बच्चन का ही नहीं है। हमारे बहुत सारे सितारे जिन ब्रांड का विज्ञापन करते हैं, उनकी गुणवत्ता, उनकी विश्वसनीयता और उनकी इमेज को उसका ब्रांडिंग करनेवाले सितारे की इमेज निखार देती है। लेकिन क्या किसी प्रोडक्ट का ब्रांड एंबेसडर बनने से पहले हमारे सितारे अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों के बारे में भी सोचते हैं, यह सबसे बड़ा सवाल है। शाहरुख खान सहित कई बड़े सितारे सालों से शराब के कई ब्रांड्स का विज्ञापन करते रहे हैं। शराब के बारे में आम तौर पर यही माना जाता है कि शराब खराब है। माधुरी दीक्षित से लेकर ऐश्वर्या राय और करीना कपूर तक गोरेपन की क्रीम के कई विज्ञापनों की बारंदिंग कर चुकी हैं। लेकिन विज्ञान कहता हैं कि किसी के भी शरीर के रंग पर उसके ब्लड सेल्स का सर्वाधिक असर होता है। और सभी जानते हैं कि कोई भी क्रीम जो बाहर से लगाई जाती है, वह किसी के भी ब्लड सेल्स नहीं बदल सकती। शाहरुख खान से लेकर सलमान खान, अमिताभ बच्चन व उनके बेटे अभिषेक बच्चन तक बहुत सारे सितारे ऑटोमोबाइल कंपनियों की  कारों और मोटर साइकिलों का विज्ञापन करते रहे हैं। और उसके माइलेज को सबसे ज्यादा फायदेमंद बताते रहे हैं। ले किन सारे लोग जानते हरैं कि जिस कार या मोटर साइकिल में जितना माइलेज बताया दजाता है, उतना असल में किसी को मिलता नहीं है। यही नहीं घोषित रूप से शरीर के लिए नुकसानदेह साबित हो चुके पान मसाला और गुटका के विज्ञापन करने में भी हमारे सितारे हमेशा से आगे रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सितारे किसी भी विज्ञापन को करने से पहले उस के बारे में कितना अध्ययन करते हैं, उसके बारे में कितनी जांच पड़ताल करते हैं। या करते भी हैं या नहीं। या उनकी नजर सिर्फ उस ब्रांड को बढ़ावा देने के बदले मिलने वाले पैसे ही है। और यह भी सवाल है कि उस उत्पाद से होनेवाले समाज को नुकसान से उनको कोई मतलब नहीं। जिस समाज ने उनको आंखों में बसाया, दिल में बिठाया और चमकता सितारा साबित किया, उसी समाज के सथ चंद रुपयों की कमाई के लिए ये सितारे धोखा क्यों करते हैं। यह भी सवाल है। इसके जवाब में एड गुरू पीयूष पांडेय की राय है कि सारे सितारों पर यह बात समान रूप से लागू नहीं होती। वे कहते है – हमारे कुछ अपने हर विज्ञापन पर बहुत रिसर्च करते हैं। वे उसकी स्क्रिप्ट पर भी बहुत विचार करके अपने आइडिया देते हैं।  पियूष पांडे की राय में अमिताभ बच्चन और आमिर ख़ान जैसे सितारों  से कोई भी कुछ भी नहीं करवा सककता। वे विज्ञापन के सामाजिक पहलू सहित हर बात का बहुत ध्यान रखते हैं। पियूष पांडे की बात सही भी है। पलावा मुंबई में विश्व स्तरीय बेहतरीन टाउनशिप है, जिससे जुड़ना अमिताभ बच्चन के लिए भी गरिमा की बात थी, लेकिन फिर भी अमिताभ बच्चन को जब लोढ़ा बिल्डर्स के पलावा टाउनशिप के ब्रांड एंबेसडर का प्रस्ताव मिला, तो उन्होंने पलावा के बारे में बहुत सारी अलग अलग जानकारियां जुटाईं। लोढ़ा ग्रुप देश का सबसे बड़ा और विश्वसनीय ग्रुप है, लेकिन फिर भी जब हर तरह से अमिताभ बच्चन लोढ़ा ग्रुप के पलावा प्रोजेक्ट के बारे में संतुष्ट हुए, तब जाकर ही उन्होंने पलावा का ब्रांड एंबेसडर बनना स्वीकार किया। पलावा में रहनेवाले बताते हैं कि अमिताभ बच्चन के कहे मुताबिक पलावा वास्तव में सबसे बेहतरीन स्थल है, जहां जिंदगी ज्यादा खुश लगती है। लेकिन हर कंपनी हर ब्रांड एंबेसडर और हर विज्ञापन के साथ ऐसा नहीं होता।
मतलब साफ है कि पेप्सी पर एक बच्ची के कमेंट के बाद अमिताभ ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को गहराई से समझा और विज्ञापन छोड़ दिया। उसके बाद उन्होंने किसी कोल्ड ड्रिंक का विज्ञापन नहीं किया। लेकिन कुछ सितारे ऐसे भी हैं, जिनके लिए सिर्फ पैसे ही ज्यादा मायने रखते हैं। उनका मानना है कि जब किसी ब्रांड का विज्ञापन कोई तो करेगा ही, तो फिर वे ही क्यों न करें। एक पान मसाला का विज्ञापन करने के बाद मनोज वाजपेई को उनके शुभचिंतकों ने सवाल पूछा कि पान मसाला तो शरीर के लिए हानिकारक है, फिर भी वे क्यों कर रहे हैं। तो उन्होंने लीपापोती करते हुए कहा कि वे जिस विज्ञापन की बात कर रहे हैं, वह पान मसाला नहीं बल्कि माउथ फ़्रेशनर है। लेकिन कमाई के लिए विज्ञापन करने में मनोज वाजपेटी किस हद तक जा सकते हैं, इसके जवाब में उनका कहना था कि जहां तक हद हो सकती है, वहां तक तो जा ही सकता हूं। फिर साफ करते हुएअ वे बोले –  हद से मेरा मतलब  है कि किसी की भावना को ठेस ना पहुंचे। और मामला कानून के दायरे में हो तो उस विज्ञापन के लिए उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। इसी तरह शाहरुख खान जिन उत्पाद का विज्ञापन करते हैं, वे उत्पाद अपनी निजी जिंदगी में वे उपयोग नहीं करते। इसी कड़ी में एड गुरू प्रहलाद कक्कड़ की बात ज्यादा मायने रखती है। उनका कहना है कि ज्यादातर सितारे जिस कंपनी का ब्रांड चमकाते हैं, उस उत्पाद को वे उपयोग ही नहीं करते। कटरीना कैफ की ही बात कर लीजिए, वह जितने प्रोडक्ट की ब्रांड एंबेसडर हैं, वे प्रोडक्ट उनके किसी काम के ही नहीं है। सरकार ने भी हाल ही में एक गाइडलाइन पास की है, कि किसी विज्ञापन में किए ग़लत दावों के लिए सितारों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मतलब साफ है कि विज्ञापनो से होनेवाली कमाई के आगे बेचारी सामाजिक जिम्मेदारी की कोई औकात नहीं है।

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