बॉलीवुड में हाशिये पर प्यार

बॉलीवुड में हाशिये पर प्यार

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प्रेम को भाषा की आवश्यकता नहीं होती, इसका अंदाजा मराठी में बनी 2016 की सबसे चर्चित फिल्म ‘सैराट’ को देखकर लगाया जा सकता है। यह फिल्म महाराष्ट्र से बाहर भी उतने ही उत्साह से देखी और सराही गई। बावजूद इसके, ‘सैराट’ को प्रेमकथा कहना ज्यादती है। शुरुआती दृश्यों में टीनेजर प्रेम की उथली सी
कथा को बयान करती यह कहानी कब परिवार, संबंध, समाज, शहर, जाति, वर्ग, राजनीति की गहराइयों में चली जाती है, इसका पता ही नहीं चलता। बीते वर्षों में जैसे-जैसे सिनेमा यथार्थ की ओर कदम बढ़ाता गया, उसमें प्रेम की मात्रा कम होती गई। यदि कोई ‘मांझी-द माउंटेन मैन’ या ‘सरबजीत’ या ‘एम एस धोनी’ परिकल्पित करता है, तो प्रेम वहां जीवन के एक अंश के रूप में ही शामिल होगा। असली पात्रों से सामना होने के बाद शायद सिनेमा को एहसास हुआ कि जीवन में प्रेम हो सकता है, लेकिन प्रेम के लिए जीवन नहीं हो सकता।
नाम का रोमांस
वर्ष 2016 में शाहरुख खान की दो फिल्में रिलीज हुई थीं। डबल रोल वाली ‘फैन’ और आधे रोल वाली ‘डियर जिंदगी’। कमाल यह कि हिन्दी सिनेमा में रोमांस के इस प्रतीक नायक की दोनों ही फिल्मों में रोमांस की भूमिका बस दाल में नमक जितनी ही दिखी, जो भोजन को स्वाद तो दे सकता है, खुद में भोजन नहीं हो सकता। शाहरुख खान के लिए इस तरह की भूमिकाओं के चयन के पीछे का कारण उम्र का दबाव बताया जा सकता है, लेकिन यह धारणा तब गलत साबित हो जाती है जब सिर्फ शाहरुख की फिल्मों में नहीं बल्कि 2016 में रिलीज हुई ज्यादातर हिन्दी फिल्मों में यह ट्रेंड दिखाई देता है।
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साल की सबसे बड़ी फिल्म मानी जाने वाली ‘सुल्तान’ में सलमान खान और अनुष्का शर्मा हैं। दोनों के बीच एक मीठी सी परंपरागत तकरार वाली प्रेमकथा भी चलती है। कुछ गाने-वाने भी हैं, लेकिन बस एक आधार तैयार होते ही फिल्म एक व्यक्ति की जिद और स्वाभिमान की कथा में तब्दील हो जाती है। पूरी फिल्म में कुछ याद रहता है तो पहलवानी के दांवपेंच और एक केबल टीवी ऑपरेटर का विश्वविख्यात पहलवान बनने का संघर्ष। 2016 की शुरुआत ‘एयरलिफ्ट’ से हुई मानी जा सकती है। युद्ध भूमि में फंसे अपने नागरिकों को निकालने की जद्दोजहद यहां इतने सशक्त रूप में प्रदर्शित की गई थी कि पति-पत्नी के प्रेम को अलग से रेखांकित करने की निर्देशक राजा कृष्ण मेनन को जरूरत ही महसूस नहीं हुई। दर्शकों को इस फिल्म में नायक-नायिका के संबंध की बस सूचना भर मिलती है।
जनवरी में ही रिलीज ‘साला खड़ूस’ में कोच और खिलाड़ी के बीच प्रेम की इतनी क्षीण रेखा बन पाती है कि अंत तक आते-आते दर्शकों के लिए वह महत्वहीन होकर रह जाती है। यहां छोटे बजट में बनी ‘गुटरु गुटरगूं’ को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता, जिसमें खुले में शौच की समस्या को रेखांकित करने के लिए पति-पत्नी के बीच के प्रेम का उपयोग भर किया जाना दिखता है। प्रेम से परे एक विराट कथा संसार से रू-ब-रू कराती इन फिल्मों का दर्शकों ने भी उत्साह के साथ स्वागत किया।
शायद इसीलिए इस वर्ष की ‘जय गंगाजल’, ‘अलीगढ़’, ‘घायल वंस अगेन’, ‘नीरजा’, ‘उड़ता पंजाब’, ‘अकीरा’ और ‘पिंक’ जैसी कई फिल्मों ने तो प्रेम की परंपरागत चर्चा की जरूरत भी नहीं समझी। अक्षय कुमार की चर्चित फिल्म ‘रुस्तम’ में प्रेम कम और धोखे अधिक दिखे। यह भी उल्लेखनीय है कि जब हिंदी सिनेमा ने प्रेम का पूरे ब्यौरों के सात बयान करने की जरूरत समझी तो उसे ‘मिरजिया’ और ‘मोहन जो दाड़ो’ की तरह पीरियड में जाना पड़ा, जबकि परंपरागत प्रेमकथा के चक्रव्यूह में फंसी ‘की और का’,‘सनम तेरी कसम’,’सनम रे’,’तुम बिन-2’,’रॉक स्टार-2’, ‘ऐ दिल है मुश्किल’ और ‘बेफिक्रे’ को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया।
वास्तव में हिन्दी सिनेमा के पास अब दर्शकों की नई पीढ़ी है। जो नए निर्देशक इस नई पीढ़ी से संवाद बना पा रहे हैं, उनकी फिल्मों में कहानी की नई शैली भी स्पष्ट रूप से रेखांकित की जा सकती है। वे न तो पुरानी कहानियों और तर्जेबयानी के मोह में हैं, न ही उसका कोई दबाव अपने ऊपर महसूस करते हैं। आश्चर्य नहीं कि सलमान खान सिर्फ दो फिल्मों का तजुर्बा रखने वाले अली अब्बास जफर के और आमिर खान डेढ़ फिल्मों के निर्देशक रहे नीतेश तिवारी के निर्देशन में काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सिनेमा के लिए नई कहानी और नई भाषा लेकर सिनेमा की खानदानी परंपरा से बाहर के लोग ही आ रहे हैं, फिर चाहे वे अनुराग कश्यप हों या फिर नीतेश तिवारी। इसका कारण यह है कि ये लोग अपने साथ एक विराट अनुभव संसार लेकर फिल्में बना रहे हैं।
जारी रहेगा सिलसिला
सुखद है कि मजबूत कहानियों का यह सिलसिला नए वर्ष में भी जारी रहने की उम्मीद बन रही है। 2017 की शुरुआत दो बड़ी फिल्मों से होने जा रही है- शाहरुख खान की ‘रईस’ और ऋतिक रोशन की ‘काबिल’। ‘रईस’ गुजरात के माफिया अब्दुल लतीफ की बायोपिक मानी जा रही है, जबकि ‘काबिल’ के प्रोमो में एक नेत्रहीन के संघर्ष को देखा जा सकता है। अक्षय कुमार की ‘जॉली एलएलबी-2’ और शाहिद कपूर की ‘रंगून’ में तो एक अलग कथाभूमि की उम्मीद की ही जा सकती है। विद्या बालन की ‘बेगम जान’, सोनाक्षी सिन्हा की ‘नूर’, अमिताभ बच्चन की ‘सरकार-3’ को लेकर भी हम आश्वस्त रह सकते हैं हिन्दी सिनेमा के लिए मुद्दे और नएपन के दबाव से बाहर निकलना आसान नहीं होगा।

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