आई होली आई रे….

आई होली आई रे….

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niranjan_parihar-निरंजन परिहार-
होली आ गई है। रंग बिखर रहे हैं। फिर सिनेमा इस माहौल से कैसे अछूता रह सकता है। सो, सिनेमा के परदे पर भी सबसे ताजा होली गीत ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ लेकर आई है। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। बरसों बरसों से सिनेमा के संसार में होली हजार रंगों के साथ हाजिर रही है। इस बार सिनेमा के परदे पर होली के गीतों का लेखा जोखा –

कोई पंद्रह दिन बीत गए, मोबाइल पर एक मैसेज आया, जिसमें रंगों में भीगती – भागती दुबली – पतली टीना मुनीम अलबेले अंदाज में गीत गाते और नाचते हुए राजेश खन्ना से शिकायती अंदाज में कहती है – ‘ओ मेरी पहले से तंग थी चोली, ऊपर से आ गई बैरन होली, जुलम तूने कर डाला, प्यार में रंग डाला, मैं तो शरम से पानी पानी हो ली….।’ शानदार दृश्य है। खूब रंग उड़ रहे हैं। और दिल झूमने लगता है। कुछ सोचूं, तभी तत्काल दूसरा मैसेज आया, जिसमें उड़ते रंगों के साथ एक सवाल था – ‘होली… कब है होली’ ? ‘शोले’ फिल्म में गब्बर सिंह का यह धमाकेदार डायलॉग और सावन कुमार की सुपर हिट फिल्म ‘सौतन’ का गुनगुनाने को मजबूर कर देनेवाला यह रंगबिरंगा गीत चार दशक बाद भी हमारी जिंदगी में उतना ही प्रासंगिक होगा, जितना उस जमाने में था, किसी ने सोचा भी नही होगा। लेकिन सचमुच, हमारे सिनेमा के इन जैसे अनेक गीत और डायलॉग हमारी जिंदगी के हिस्से के रूप में हमारी यादों के साये में साथ साथ चलते रहते हैं। सावन कुमार कह रहे थे – ‘सिनेमा हमारी जिंदगी का आईना है, जो समाज में हो रहा होता है, वही हम लोग दिखाते हैं। फिर होली तो हमारी जिंदगी का वो पहलू है, जिसमें उल्लास, उमंग, उत्साह सहित जिंदगी के वे सारे ही रंग हैं, जो हमें भीतर तक रंगों से सराबोर कर देते हैं। इसीलिए फिल्मों में होली का महत्व उतना ही है, जितना हमारी असल जिंदगी में है।’
होली सचमुच आ गई है। आप जब यह पढ़ रहे होंगे, तब भले ही होली, बिल्कुल सर पर होगी। लेकिन कोई पंद्रह दिन पहले से ही वॉट्सएप से लेकर फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ‘सौतन’ के गीत और ‘शोले’ के डायलॉग की तरह ही होली के अनेक गीतों और उड़ते अबीर – गुलाल की तस्वीरों के साथ होली का सुरूर अपने पंख पसार चुका था। सावन कुमार की बात बिल्कुल सही है कि हमारी जिंदगी में जिस तरह से होली में रंग-गुलाल और गीत – संगीत की जगह है, उसी तरह सिनेमा में भी होली के गीतों की एक अलग ही जगह है। दो दिन पहले ही वरुण धवन और आलिया भट्ट की फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ रिलीज हुई है, उसमें भी होली का एक शानदार गीत है। भले ही इस गीत को बहुत देखा – सुना तो जा ही रहा है, खूब गुनगुनाया भी जा रहा है और पसंद भी किया जा रहा है। लेकिन, हमारे सिनेमा में होली के गीतों को पिरोने का सिलसिला कोई नया नहीं है। हमारे सिनेमा में दिखनेवाली शुरूआती होलियों में सबसे पहला नाम आता है 50 के दशक की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म ‘आन’ का, जिसमें होली खेलते और नाचते – गाते दिलीप कुमार और निम्मी ने खूब वाह वाही लूटी। इसके ठीक बाद सन 1958 की सुपर हिट फिल्म ‘मदर इंडिया’ में मशहूर गायिका शमशाद बेगम का गाया ‘होली आई रे कन्हाई’ गीत खूब सराहा गया। साल भर भी नहीं बीता, और महिपाल और संध्या की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘नवरंग’ में वी शांताराम ने होली का एक और रंग अपने अलग और बहुत गजब अंदाज में पेश किया। इस गीत में महिला और पुरुष की दोहरी भूमिका में मंच पर ‘चल जा रे हट नटखट, ना छेड़ मेरा घूंघट, पलट के दूंगी आज तुझे गाली रे, मुझे समझो ना तुम भोली भाली रे…’ गीत पर दोहरी भूमिका में नाचते हुए संध्या को देखना आज भी दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर देता है।
‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो’ गीत से सजी फ़िल्म ‘कोहिनूर’ सहित ‘गोदान’ और ‘फूल और पत्थर’ में भी होली के शानदार गीत थे, जो अब तक बहुत मजे से सुने जाते हैं। साठ के दशक की इन फिल्मों के अलावा सन 1970 में आई राजेश खन्ना और आशा पारेख की फ़िल्म ‘कटी पतंग’ में सामाजिक परंपराओं में बंधकर जीने को मजबूर एक विधवा बनी आशा पारेख होली नहीं खेलती। लेकिन ‘आज न छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली, खेलेंगे हम होली’ गीत गाते हुए राजेश खन्ना होली पर उन्हें न छोड़ने का ऐलान करते हैं। फूल और पत्थर में ‘लाई है हजारों रंग होली’ के साथ धर्मेंद्र का विधवा मीना कुमारी के प्रति अंतरंग लगाव उनके भीतर की डर से भरी अंतर्मन की भावनाओं को दर्शाता है।
फिर आया अस्सी का दशक, जिसमें होली के पर्व और उसके रंगों व गीतों को सिनेमा में सबसे ज्यादा जगह मिली। ‘होली… कब है होली’..? और ‘बुरा ना मानो होली है’ जैसे डायलॉग इसी दौर में सिनेमा से समाज को मिले। सन 1973 में वहीदा रहमान और धर्मेन्द्र की फ़िल्म ‘फ़ागुन’ में ‘फ़ागुन आयो रे’ और इसी साल आई राजेश खन्ना की ‘नमक हराम’ के गीत ‘नदिया से दरिया’ भी सिनेमा के संसार में होली के सफर का अहम पड़ाव माना जाता है। रेखा और राजेश खन्ना पर फिल्माए आरडी बर्मन के संगीत से सजे इस गीत को किशोर कुमार ने बहुत शानदार अंदाज में गाया है। चार दशक बाद भी यह गीत आज भी कानों में रस घोल देता है। इसके बाद सन 1975 में आई ‘शोले’, जिसमें गब्बर सिंह बने अमजद खान अपने साथी डाकूओं से बहुत गर्जीले सवालिया अंदाज में पूछते हैं – ‘होली… कब है होली’..? और डाकूओं के हमले से अनजान रामगढ़वासी ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं’ गीत पर झूमते नाचते नज़र आते हैं। यह गीत अब भी हर होली पर हर घर में गूंजता सुनाई देता है। इसी साल आई फ़िल्म ‘ज़ख़्मी’ में डफ़ली बजाते हुए सुनील दत्त ‘होली आली रे, आली रे, होली आली, मस्तानों की टोली, तूफान दिल में लिए….’ गाते हुए नज़र आते हैं। होली के इस गीत के जरिए इस फिल्म में सुनील दत्त अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ खुली जंग छेड़ने का ऐलान कर रहे होते हैं। इसके तत्काल बाद सन 1978 में बासु चटर्जी के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘दिल्लगी’ में हेमामालिनी के साथ वाली इस फिल्म में धर्मेन्द्र पर फिल्माया गीत ‘कर गई मस्त मुझे’ सुनकर आज भी मन मस्त हो उठता है।
वैसे देखा जाए तो, होली के गीतों में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन सबसे सिरमौर रहे हैं। राजेश खन्ना तो खैर, अब इस दुनिया में रहे नहीं, मगर उन पर फिल्माए गीत अमर हो गए हैं। फिर भी, फ़िल्मों में होली की चर्चा चलते ही सबसे प्रमुख जो चेहरा आंखों के सामने आता है, वह अमिताभ बच्चन का ही है। और जो गीत सबसे पहले जुबां पर आता है, वह भी उन्हीं की फिल्म ‘सिलसिला’ का ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे’ ही है। अमिताभ बच्चन ने जब इस गीत को अपनी आवाज दी थी, तो तो उस समय किसी ने यह सोचा तक नहीं था कि चार दशक बाद भी हर साल होली पर यह गीत मस्ती के सारे रंगों पर बहुत भारी साबित होगा। सालों बाद एक बार फिर ‘बागबान’ में अमिताभ बच्चन ने रंगों का ऐसा खेल खेला कि एक दशक बाद भी हर कोई ‘होरी खेले में रघुवीरा, अवध में होरी खेले…’ सुनकर मोहित हो जाता है। ‘शोले’ के सदाबहार गीत ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, में भी मस्तानों की टोली में अमिताभ बच्चन ही थे। राजेश खन्ना की फिल्म ‘राजपूत’ के ‘भागी रे भागी ब्रृज की बाला’ भी होली के गीतों में प्रमुख कहा जाता है। वैसे देखा जाए तो, सिनेमा के संसार में होली की ख़ुशियों को जीवन में उदासी के आलम को तिरोहित करने के तरीके के रूप में भी हर बार समायोजित किया गया है। हीरो चतुराई से विधवा नायिका को खुले आम स्वीकार करने का मौका नहीं छोड़ता। ‘कटी पतंग’ में राजेश खन्ना उत्साह से ‘आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली खेलेंगे हम होली..’ आशा पारेख के लिए गाते हैं और वह रोते दिल से इस तरह जवाब देती है ‘अपनी अपनी किस्मत देखो, कोई हंसे कोई रोए।’ धनवान’ में राजेश खन्ना ‘मारो भर भर भर पिचकारी’ गाते हुए रीना राय को एक और मौका देने की गुजारिश करते नजर आते हैं। राकेश रोशन की फ़िल्म ‘कामचोर’ का गाना ‘रंग दे गुलाल मोहे’ ने मिलन- जुदाई के रंग को परदे पर दिखाया। तो अनिल कपूर और रति अग्निहोत्री के साथ मुंबई की गलियों में खेली जाने वाली होली को सन 1984 में फ़िल्म ‘मशाल’ में देखा गया, जिसमें ‘होली आई, होली आई, देखो होली आई रे’ गीत में होली की मस्ती के जबरदस्त रंग बिखरे।
सिनेमा के संसार में इसके बाद माहौल में बदलाव आना शुरू हो गया। सन 1985 में फिल्म ‘आख़िर क्यों’ में स्मिता पाटिल रिश्तों के बदलते रंगों को ‘सात रंग में खेले’ गीत में देखती हैं। सन 1993 में जूही चावला और सनी देओल की फ़िल्म ‘डर’ के गीत ‘अंग से अंग लगाना सजन हमें ऐसे रंग लगाना’ ने तो खूब धूम मचाई। शाहरुख खान की सन 2000 में आई फ़िल्म ‘मोहब्बतें’ में होली ने कुछ कुछ शहरी होना शुरू कर दिया था। मोहब्बते का ‘सोणी सोणी अंखियों वाली…’ गीत शहरी होने के कारण ही आज भी नई पीढ़ी में बहुत पसंद किया जाता है। अक्षय कुमार और प्रियंका चोपडा़ की सन 2005 में आई फिल्म ‘वक्त- द रेस अगेंस्ड टाइम’ में ‘डू मी ए फेवर लेट्स प्ले होली’ में भी कुछ आधुनिकता घुली हुई सी दिखी। सन 2013 में तो होली बिल्कुल ही बदल गई। इस साल आई दीपिका पादुकोण रणबीर कपूर की फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ में ‘बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी, तो सीधी सादी छोरी…’ ने तो होली के गीत की फिजां ही बदल दी। इसके एक साल बाद ही फ़िल्म ‘रामलीला’ का ‘लहू मुंह लग गया’ भी जवां दिलों की धडकन के रूप में देखा जाता है। और अब आई है वरुण धवन और आलिया भट्ट की फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’, जिसमें होली का एक बेहद आधुनिक सा गीत लोकों के बहुत लुभा रहा है। इन सबके बीच और भी बहुत सारी फिल्मों में बहुत अलग अलग रूपों में होली के गीत और दृश्य हमारे सिनेमा बनानेवाले परोसते रहे हैं। फिल्मकार सावन कुमार सही कह रहे थे कि होली हमारी जिंदगी का हिस्सा है, तो सिनेमा भी जिंदगी का आईना है। इसीलिए, होली के रंग सिनेमा और जिंदगी दोनों में समान रूप से एक साथ दिखते हैं।

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