सिनेमा से गायब हो गए राजमहल और राजा-रानी

सिनेमा से गायब हो गए राजमहल और राजा-रानी

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-साक्षी त्रिपाठी-
सिनेमा के परदे से राजमहल रूखसत हो गए। राजा महाराजाओं की कहानियां विदाई ले चुकी हैं। सामाजिक परंपराओं और मूल्यों के नाम पर इतिहास से छेड़छाड़ किए जाने के नाम पर विरोध की विरासत फन फैलाती जा रही है। जो माहौल बन रहा है, उसमें सबसे बड़ा डर यह है कि आनेवाले कुछ सालों बाद हमारा दर्शक कहीं, राजमहलों, राजाओं और रानी मां व राजकुमार व राजकुमारियों के किस्सों से बिल्कुल ही वंचित न हो जाए !
अमिताभ बच्चन अब हमारे सिनेमा में शहंशाह हैं। शाहरुख खान बादशाह है। दिलीप कुमार अभिनय की एक खास विधा के किंग है। धर्मेंद्र राजकुमार कहे जाते रहे हैं और विनोद खन्ना ठाकुर। सैफ अली खान असल जिंदगी में नवाब हैं ही। राजा बुंदेला भी असल जिंदगी में राजा। राजकुमार राजा के रूप में विख्यात थे, तो शशि कपूर राजकुमार। वहीदा रहमान रानी साहिबा के रूप में विख्यात थी, और निरूपा राय राजमाता के रोल में दमकती थीं। मीना कुमारी राजकुमारी हुआ करती थी और हेमामालिनी तो दुनिया भर में आज भी ब्यूटी क्वीन के नाम से ही जानी जाती है। ऐश्वर्या राय सौंदर्य की मल्लिका और प्राण कभी सेनापति तो कभी किसी रियासत के मालिक और कभी जागीरदार हुआ करते थे। लेकिन सिनेमा के ताजा माहौल को देखे, तो राजा – महाराजा, रानी – महारानी, राजमाता, राजकुमार, राजकुमारी, किंग – क्वीन शहंशाह, बादशाह, नवाब, जागीरदार, ठाकुर, मल्लिका, जैसे ये महिमामयी पद अब सिर्फ शब्द भर रह गए हैं। जिसकी खास वजह यही है कि इनकी पृष्ठभूमि पर फिल्में बननी बंद सी हो गई हैं। भले ही शाही शान, राजसी विरासत, मुगलिया सल्तनत, किलों के भीतर की कमजोर कहानियां और सिंहासन की शान में सिसकते शौक के किस्से सभी को लुभाते हैं, लेकिन राजसी परिवेश और किलों और महलों के अंदर की कहानियों पर बननेवाली फिल्मों पर विवाद बहुत जल्द जोर पकड़ लेते हैं। इसीलिए राजसी पार्श्वभूमि वाली कहानियों पर सिनेमा बनने कम क्या हो गए, सिनेमा से सारा राजसी वैभव ही रुखसत हो गया।
दरअसल, सिनेमा से राज दरबार का रौबदाब रुखसत हो चुका है और कहानियों में भी रियासती रस्मो – रिवाज और परंपराओं का पटाक्षेप हो चुका है। सिनेमा के परदे पर अब न आलीशान महल दिखते हैं, न तख्तो ताज के वैभव की विरासत। सिनेमा के विषय बदले, तो ‘मैं गलियों का राजा, तू महलों की रानी’ जैसे गीत सुनने को कान भी तरसने लगे। बहुत दूर से दिखता किसी किलेनुमा महल के सबसे ऊंचे मेहराब पर लगा राजसी ध्वज, भव्य राजमहलों के लक-दक करते रंग महल, लंबे लंबे सिल्क के परदों से पटे पटांगण, सुशोभित लिबास से सजे दरबान, रंग बिरंगे मंडप, शाही सजावटवाले हाथी और तेज धार से खनखनाती तलवारें अब सपने जैसी लगने लगी हैं।
राजा महाराजाओं का ग्लैमर हमारे समाज में शुरू से ही रहा है। राजमहल लोगों को लुभाते रहे हैं और राज परिवारों के किस्से कहानियां भी हर किसी को अपनी ओर खींचती आती रही हैं। यह सही है कि राजमहलों के किस्से अकसर बाहर नहीं आते, लेकिन जो आએए उन्हें बड़े चटखारे लेकर सुना जाता रहा है। इसी कारण भव्यतम राजमहलों की ऊंची दीवारों के भीतर का मायावी जीवन और उस जीवन का वैभवशाली अंदाज हर किसी के लिए हमेशा से उत्सुकता का विषय रहा है। जोधपुर का उम्मेद भवन पैलेस, उदयपुर का लेक पैलेस, जयपुर का सिटी पैलेस, जैसलमेर की हवेलियां, सामोद का पैलेस, मैसूर का ललित महल पैलेस और ऐसे ही देश के जाने कितने राजमहल पता नहीं कितनी फिल्मों में कितने सारे राज परिवारों के महल के रूप में देखे जाते रहे हैं। इन राजमहलों के रंग राजशाही और बादशाहत पर बनी फिल्मों के इतिहास में झांककर देखें, तो ऐतिहासिक फिल्मों की शुरुआत हुई थी साल 1924 में ‘सती पद्मिनी’ से। निर्माता बाबूराव पेंटर की यह फिल्म चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी पर बनी थी, जिनके सौंदर्य पर मोहित होकर दिल्ली का सुलतान अलाउद्दीन खिलजी पद्मिनी को पाने के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण कर देता है। लेकिन पद्मिनी हजारों महिलाओं के साथ अग्नि को समर्पित होकर जौहर कर लेती है। ‘सती पद्मिनी’ मूक फिल्म थी, जिसे भारत में तो लोगों ने जमकर देखा ही, उस समय इंग्लैंड में भी बहुत दर्शक मिले। संजय लीला भंसाली इसी विषय़ पर फिल्म बनाने जा रहे हैं, लेकिन राजपूतों के विरोध के कारण उन्हें पसीने आ रहे हैं। जयपुर में शूटिंग के दौरान तो उन पर हमला भी हुआ। माना जा रहा है कि भंसाली ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करके पद्मिनी का गलत चरित्र चित्रण पेश करने जा रहे हैं, इसी कारण विवाद हुआ है। भारत में बोलती फिल्मों की शुरुआत ‘आलमआरा’ से हुई थी। यह भी एक राजकुमारी की प्रेम कहानी ही थी। सोहराब मोदी की यह फिल्म उस जमाने में मील का पत्थर साबित हुई। सोहराब मोदी की अन्य ऐतिहासिक फिल्मों में ‘पुकार’, ‘सिकंदर’, और ‘झांसी की रानी’ भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में ही थीं, जिनको खूब सराहा गया। कमाल अमरोही की 1983 में आई हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र और परवीन बॉबी अभिनीत फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ दिल्ली की सुल्तान रजिया के जीवन पर थी। इस फिल्म से पहले भी सन 1961 में देवेन्द्र गोयल ने ‘रजिया सुलतान’ बनायी थी।
वैसे, देखा जाए, तो हमारे सिनेमा में राजाशाही के मुकाबले मुग़लकालीन बादशाहों पर फिल्में ज्यादा बनी हैं। मगर, इस फिल्मों में सामंतशाही और ठाकुरों की आपसी जंग और उनके साहस को सलाम करने को विषय बनाकर पेश की गई फिल्मों को भी अगर जोड़ दिया जाए, तो आंकड़ा कुछ ज्यादा हो जाता है। मुगल बादशाहों पर बनी फिल्मों में अकबर, जहांगीर और शाहजहां हमारे सिनेमा बनानेवालों के पसंदीदा चरित्र रहे हैं। ऐतिहासिक फिल्मों की पटकथाओं में साम्राज्यों की कहानियां, भव्य सजीले महलों और उनकी शान ने पूर्णता प्रदान की। हालांकि विषय जब राजशाही का हो, तो उसमें ग्लैमर की भव्यता तो बढ़ जाती है, लेकिन मनोरंजन की संभावनाएं उसी के अनुपात में कम हो जाती हैं। इसीलिए, हमारे सिनेमावाले जब कभी दर्शकों को जोड़ने के लिए ऐतिहासिक किरदारों की कहानियों में थोड़ा सा कोई तड़का लगाते हैं, तो उनका हश्र भी संजय लीला भंसाली वाला ही हो जाता है। विख्यात निर्माता श्याम बेनेगल ने जब करिश्मा कपूर को लेकर ‘जुबैदा’ बनाई, तो इस फिल्म को जोधपुर के महाराजा हनुवंत सिंह की शान में गुस्ताखी मानकर राजस्थान के राजपूतों ने कोहराम मचा दिया था। दरअसल, जुबैदा जोधपुर के महाराजा की प्रेमिका थी, जिन्हें वे अपने निजी हवाई जहाज में साथलेकर कहीं जा रहे थे, तो वह विमान आकाश में टकराकर सुमेरपुर के पास जवाई नदी में गिर गया और दोनों वहीं मर गए थे। इस विषय पर बनी फिल्म ‘जुबैदा’ पर बहुत विवाद हुआ। इसी तरह राजस्थान की सामंती परंपराओं को विषय बनाकर बुनी गई धर्मेंद्र की फिल्म ‘गुलामी’ पर भी राजस्थान में बहुत विवाद हुआ।
मुगल बादशाह अकबर के जीवन को दो भव्य फिल्मों में बहुत शानदार ढंग से प्रस्तुत किया गया। सन 1960 में बनी ‘मुगले आज़म’ एक असाधारण फिल्म थी। जिसे हिंदी सिनेमा की अब तक की श्रेष्ठ कृति माना जाता है। ‘मुगले आज़म’ के रिलीज़ वाले साल में ही फिल्म ‘कोहिनूर’ भी रिलीज़ हुई, जिसमें एक रोमांचक और उत्साहपूर्ण कहानी थी, जिसमें कॉमेडी, रोमांस और राजनीतिक तिकड़मबाज़ी शामिल थी। इसके लगभग 50 साल बाद आशुतोष गोवारीकर ने फिल्म ‘जोधा अकबर’ बनाई, जो तब की काल्पनिक गाथा कहती है, जब अकबर बादशाह जवान हुआ करते थे। फिल्म में जवान अकबर अपना साम्राज्य स्थापित करने के प्रयासों में है, इन प्रयासों में राजपूत राजाओएं की राजकुमारियों से अकबर के विवाह भी शामिल है। इससे काफी पहले आई फिल्म ‘अशोका’ में शाहरुख खान को एक काल्पनिक कहानी में सम्राट अशोक के रूप में दिखाया गया है। फिल्म की कहानी युद्ध की भयावहता का संदेश देने हेतु समानान्तर पौराणिक प्रमाण प्रस्तुत करती है। मनमोहन देसाई ने सन 1977 में ‘धरम वीर’ बनाई, जो दो बिछुड़े भाईयों पर बनी फिल्म थी। सन 2009 में आ तेलुगू फिल्म ‘मागाधीरा’ अपरिहार्य इतिहास, खतरनाक भूभाग, बड़ी आलीशान रंगभूमि और परिष्कृत पोषाक वाली सेना के संयोजन के चलते भौंचक्का करती थी। हालांकि गोल्डी बहल की ‘द्रोण’ और सलमान खान की फिल्म ‘वीर’ भी काल्पनिक इतिहास से प्रेरित फिल्में थी, और दर्शकों ने उन्हें नहीं पसंद किया। आशुतोष गोवारीकर की हड़प्पा सभ्यता पर आधारित ‘मोहनजोदड़ो’ फिल्म को भी दर्शकों ने पसंद नहीं किया। ‘राज कुमार’, ‘सिंहासन’, ‘राजतिलक’ और ‘युवराज’ आदि राजशाही पृष्ठभूमि की फिल्में ठीकठाक ही रही। लेकिन अकबर खान की ‘ताजमहल’ भी फ्लाप हो गई। जिसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि इतिहास की अति विवेचना एवं अतितथ्यात्मकता भी दर्शकों को पसंद नहीं आती। हालांकि संजय लीला भंसाली की पिछले साल आई ‘बाजीराव मस्तानी’ को गजब सफलता मिली। इस फिल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए।
दरअसल, ताजा माहौल में सिनेमा के लिए जो सामाजिक स्वरूप बन रहा है, उसमें ऐतिहासिक फिल्म बनाने की कोई हिम्मत इसलिए नहीं जुटा पाता क्योंकि चुनौतियां बहुत हैं। फिर भी देखा जाए तो, सन 1934 में बनी ‘राजपुतानी’ फिल्म में क्षत्रियों के सामाजिक मूल्यों, पारीवारिक परंपराओं व संस्कारों को बेहद स्वाभाविकता से पेश किया गया था। लेकिन ऐतिहासिक चरित्रों एवं ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म बनाने के कई खतरे हैं। पहला तो यह कि कोई बहुत प्रामाणिक इतिहास नहीं मिलता। दूसरा यह कि ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर अलग अलग तरह की बहुत सारी धारणाएं हैं जिनमें से किसी एक को लेकर फिल्म बनाई जाए, तो भी विवाद की आशंका बनी रहती है। सबसे पहले तो फिल्म कू शूटिंग में अडंगे, फिर भी अगर बना लो तो कोर्ट में घसीटे जाने का डर, कोर्ट से निकल लो, तो सेंसर बोर्ड की कैंची, वहां से बरी हो जाओ तो दर्शक को सिनेमा घर तक पहुंचने पर हो हल्ले का डर। सो, सवाल यही है कि एतिहासिक पृष्ठभूमि की फिल्में जब तक तथ्यों और सामाजिक परंपराओं के पैमाने पर जांची जाती रहेगी, तब तक उनका सफल होना आसान नहीं है। और अगर, आसान नहीं है तो फिर सिनेमा के परदे पर फिर से राज महलों के रंग देखना सपना ही बना रहेगा।

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