गालियां सुहाने लगी हैं सिनेमा को

गालियां सुहाने लगी हैं सिनेमा को

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niranjan_parihar-निरंजन परिहार-
सिनेमा में गालियों का भरपूर प्रयोग होने लगा है। दर्शक को भी यह सब भाने लगा है। खासकर हीरोइनों के मुंह से गालियां सुनना दर्शक को ज्यादा सुहाता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते महेश भट्ट भी हुए गालियों से भरपूर एक फिल्म लेकर आ रहे हैं। बीते कुछेक सालों में यह परंपरा प्रभावी रूस से लगातार विस्तार लेती जा रही है। इसी पर इस बार यह लेख –

विद्या बालन की आनेवाली फिल्म ‘बेगम जान’ रिलीज होने से पहले ही खूब सुर्खियां बटोर रही हैं। ‘बेगम जान’ में महिलाओं के मुंह से खूब गाली-गलौच सुनने को मिलेगा। विद्या बालन के अलावा नसीरुद्दीन शान, रतिज कपूर, आशीष विद्यार्थी, इला अरुण और गौहर खान भी बेहद अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। विद्या सहित बाकी हीरोइनें भी इस फिल्म में खूब गालियां देती नजर आएंगी। विद्या इस फिल्म में एक कोठे की मालकिन ‘बेगम जान’ की भूमिका में हैं, जिनके साथ और भी बहुत सारी लड़कियां हैं। ‘बेगम जान’ इन सबके साथ मिलकर अपने घर को बचाने की लड़ाई लड़ती हैं। महेश भट्ट की इस फिल्म में विद्या के कई ‘पावरफुल’ गालियों से भरे डायलॉग हैं।
यह नए जमाने की नई फिल्मों का नया कैनवास है, जो नए समाज में नई भाषा के जरिए सफलता के नए प्रतिमान गढ़ रहा है। दुनिया भर में तो वक्त के साथ बदलाव होता ही रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में हमारे सिनेमा में भी बहुत कुछ बदला – बदला सा है। हीरो – हीरोइन अब पेड़ के चक्कर लगाकर प्रेम का इजहार नहीं करते। दो फुलों का हिलकर मिलना तो वैसे भी चार दशक पुरानी बात हो चुकी। अब तो वे सीधे अंग से अंग भिड़ाकर गले लगते हैं, लंबी सांसों की सिसकारियां भरते हुए अपने होठ एक दूसरे से भिड़ाते हैं और भावनाओं के संसार में गोते लगाते हुए सीधे बिस्तर गरम करते हुए कैमरे में कैद होने के बाद सीधे परदे पर देखे जाते हैं। इमोशनल सीन अब आउट है और आंसू बहाना पुरानी फिल्मों की कॉपी करना माना जाता है। बदलाव बहुत सारे बहादुरी भरे बहावों के साथ आया है, जो देह के दावानल से तुष्ट होकर भाषा के तीखे नमकीन स्वरूप में हमारे सामने खड़ा है। दर्शक को भी अब सब कुछ खुला खुला सा देखने को चाहिए, सो परासा भी जा रहा है। हालांकि इस तरह की ज्यादातर फिल्मों में असंसदीय और गाली गलौज वाले डायलॉग आमतौर पर सेंसर बोर्ड की कैंची से कट जाते हैं। लेकिन महेश भट्ट ने अपनी इस ‘बेगम जान’ को सेंसर बोर्ड से बचा लिया है।
वैसे, ‘बेगम जान’ कोई पहली फिल्म नहीं है, जिसमें गालियों का जमकर प्रयोग किया गया है। सालों सालों से समाज की असली तस्वीर पेश करने के नाम पर सिनेमा में समाज की बोलचाल की भाषा का खुलकर प्रयोग करने के नाम पर गालियों का भी उपयोग किया जाता रहा है। समाज जब से खुलेपन को कुछ ज्यादा ही स्वीकारने लगा है, तब से बोल्ड विषयों पर फिल्मों का भी बनना भी बहुतायत से शुरू हो गया है। इन फिल्मों में बोल्ड बातें भी खुलकर पेश की जाने लगी हैं। सन 2010 और 2011, ये दो साल खुलेपन के लिए कुछ ज्यादा ही खुलेपन के साथ आये थे। सेंसर बोर्ड ने जब गालियों से भरी ‘नो वन किल्ड जेसिका’ और ‘देल्ही बेली’ जैसी फिल्मों को पास कर दिया तो दर्शकों को भी ये फिल्में काफी पसंद की। इसके बाद आई ‘द डर्टी पिक्चर’ जैसी फिल्म में भी किरदारों और फिल्मी जीवन को वास्तविक रूप देने के नाम पर मुखर संवाद और गालियों का भी जमकर प्रयोग किया गया। वैसे, गालियां पहले भी फिल्मों में सुनाई देती रही हैं। ‘बेंडिट क्वीन’ में तो गोलियां और गालियां दोनों ही जमकर सुनाई दी थीं। उससे पहले नायिकाएं इस तरह के संवादों को बोलने में परहेज करती थीं। मगर, सन नसीरुद्दीन शाह की मुख्य किरदारवाली फिल्म ‘इश्किया’ में विद्या बालन ने भरपूर गालियां बोली थी तो ‘नो वन किल्ड जेसिका’ में रानी मुखर्जी ने अपनी मासूम सी छवि के साथ बदलाव का प्रयोग करते हुए खूब गालियां दी थीं। ‘नो वन किल्ड जेसिका’ में रानी मुखर्जी एक न्यूज टेलीविजन पत्रकार के रोल में थी जो खूब सिगरेट पीती है और शान से गालियां भी देती है। इस फिल्म में ‘आई एम ए बिच’ उनका सबसे प्रचलित डायलॉग था। इसके साथ ही आई फिल्म ‘देल्ही बेली’ ने तो गालियां देने की सारी सीमाएं ही तोड़ दीं थीं। पूरी फिल्म गाली-गलौज से भरी हुई है। बोल्डनेस और गालियों के प्रयोग के मामले में आमिर खान की यह फिल्म बाकी फिल्मों से एक कदम आगे रही। वैसे, भी आमिर ने कहा था कि उनकी इस फिल्म से हिंदी सिनेमा में एक नया रास्ता खुलेगा। गोलमाल में करीना कपूर भी गालियों के उच्चारणवाले मिलते जुलते शब्द बोल बोल चुकी है। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ फिल्म की तो पृष्ठभूमि ही गालियों वाली कहानी की थी। इस तरह की फिल्मों में असलियत को दिखाने का दावा करते हुए गालियों का दिल खोल कर प्रदर्शन किया जाना आसान भी है। ‘रामन राघव’, ‘उड़ता पंजाब’, ‘बॉम्बे वेलवेट’, ‘देव डी’, ‘मस्तीजादे’, ‘ग्रैंड मस्ती’ में भी गालियों का खुला प्रयोग हुआ हैं।
वैसे, इस तरह की फिल्मों का समाज में अकसर विरोध होता रहा है। समाज शास्त्री मानते हैं कि सिनेमा समाज को दिशा देता है। और उसमें जो दिखता है, समाज उससे बहुत कुछ सीखता है। समाज शास्त्री डॉ. विजय शर्मा कहते हैं कि सिनेमा बनाते वक्त बहुत सावधानी रखनी चाहिए। आखिर सिनेमा बनानेवालों की भी कोई सामाजिक जिम्मेदारी भी होती है। लेकिन फिल्म निर्माता महेश भट्ट मानते हैं कि सिनेमा समाज का आईना है। जो समाज में होता आया है, जो हो रहा है, और जो होगा, वही सिनेमा में भी दिखता है। आखिर गालियां भी हमारे जीवन का हिस्सा है, लोग रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत गालियां बोलते हैं। फिर, महेश भट्ट की ‘बेगम जान’ तो है ही उस धंधे की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म, जिसमें जिंदगी खुद किसी गाली से कम नहीं है। सो, महेश भट्ट का कहना है कि उस धंधे में शामिल लोगों पर बनी फिल्म के किरदारों द्वारा परदे पर गालियां बोलने को समाज को भी सहज लेना चाहिए। वैसे भी गालियां आम लोगों की बातचीत का सहज हिस्सा बन गई है और रियलिस्टिक सिनेमा दिखाने के लिए यह जरूरी है कि हम उन्हें बोलचाल के वास्तविक तरीके से ही पेश करें। लेकिन सामाजिक मुद्दों पर कई पुस्तकें लिख चुकी जानी मानी लेखिका श्रीमती मंजू लोढ़ा कहती हैं कि फिल्मों का हमारे समाज पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव ज्यादातर बुरा ही होता है। भले ही सिनेमा में समाज की सच्चाई दिखाई जाती है, लेकिन देश के किसी कोने के, किसी गांव के, किसी परिवार के, किसी एक व्यक्ति की, निजी जिंदगी की कहानी में पेश सच्चाई, जब बड़े परदे पर पूरा समाज देखता है, तो उससे नकारात्मकता ज्यादा बढ़ती है। मंजू लोढ़ा मानती है कि ऐसे सिनेमा देखनेवाले बच्चे वैसा करेंगे और मानेंगे कि ऐसा करने में कोई गलती नहीं है। जबकि इसके उलट, गालियों से भरपूर फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर बनानेवाले निर्देशक अनुराग कश्यप मानते हैं लोग अगर खुद के लिए जिम्मेदार रहे तो गालियां इतनी बुरी नहीं लगेंगी, जितना लोग सोचते हैं। आखिर वे भी हमारी बोलचाल का हिस्सा ही तो हैं।
वैसे इस पूरे माहौल पर एक बेहतरीन छविवाली हीरोइन के रूप में स्थापित विद्या बालन कहती हैं – ‘जब कलाकार को अपनी कला को बेहतरीन तरीके से पेश करना पहली जरूरत हो, तो फिर कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। मेरे लिए किसी फिल्म में काम करना सिर्फ एक किरदार को निभाना होता है। फिर, हम लोग निजी जीवन में लोगों के मुंह से वैसे भी आमतौर पर गालियां सुनते रहते हैं। विद्या कहती हैं, ‘बेगम जान’ के रूप में मैं और इस फिल्म की सारी लड़कियां जिस काम में हैं, उनके लिए गाली देना बहुत आसान काम है। ऐसे में मुझे जब ‘बेगम जान’ का रोल मिला तो गाली देने से बचने का मेरे पास कोई चारा नहीं था। विद्या ने यह भी कहा कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान वह इतनी गालियां बोल चुकीं हैं कि वह अब गालियां देने में बहुत सहज हो गई हैं। वैसे असल बात यह है कि किसी महिला, और खासकर हीरोइन के मुंह से पुरुष दर्शक को गालियां सुनना ज्यादा सुहाता है, इस तथ्य को महेश भट्ट से ज्यादा और कौन समझ सकता है। इसीलिए आनेवाली फिल्म बेगम जान में विद्या बालन सहित सभी हीरोइनों से महेश भट्ट ने खूब गालियां दिलवाई हैं। आपको भी हीरोइनों के मुंह से गालियां सुनना गवारा हो, तो ‘बेगम जान’ बस आ ही रही है।

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