सुहाता नहीं सेंसर का साया

सुहाता नहीं सेंसर का साया

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-निरंजन परिहार-
सेंसर सताता है। उसकी कैंची चलते ही नुकसान बहुत होता है। समय का और पैसे का भी। और बहुत डर लगता है बहुत कुछ व्यर्थ में यूं ही चले जाने का। निर्माता को पैसे का नुकसान। निर्देशक को उसकी क्षमता के प्रदर्शन में कमी का डर। लेखक को उसके डायलॉग डूबने का डर। कलाकार को अपना अभिनय सामर्थ्य कम प्रदर्शित होने का डर। हर तरफ डर ही डर। बीते कुछ सालों में सेंसर का यह डर कुछ ज्यादा ही जोश में है।

विद्या बालन की गालियों से भरपूर फिल्म ‘बेगम जान’ में बहुत कुछ खुला खुला सा है, लेकिन फिर भी विद्या को शिकायत है कि उनकी इस फिल्म में जो कुछ दिखना चाहिए था, जो कुछ सुना जाना चाहिए था, और जो कुछ महसूस किया जाना चाहिए था, उसके मुकाबले बहुत कम देखा, सुना और महसूस किया जा रहा है, क्योंकि सैंसर ने बहुत कुछ काट डाला है। स्वरा भास्कर के दिल की गहराइयों में उतर जानेवाले अभिनय से लकदक फिल्म ‘अनारकली ऑफ आरा’ समाज के बड़े लोगों के विद्रूप असली चेहरे के बीच एक अकेली औरत के संघर्ष की कहानी है। अनारकली के रूप में स्वरा को खूब तारीफ मिली। लेकिन फिर भी स्वरा के मन में कसक है। कसक यह कि सेंसर की केंची नहीं चली होती, तो अनारकली ऑफ आरा का धमाका कुछ ज्यादा ही बड़ा होता।
यह शिकायत सिर्फ विद्या बालन और स्वरा भास्कर को ही नहीं, बल्कि हर कलाकार, हर निर्माता और हर निर्देशक को, यहां तक कि हर दर्शक को भी है। हर निर्माता सिनेमा के परदे पर सब कुछ परोस कर कमाना चाहता है। हर निर्देशक अपने हीरो – हीरोइन से हर तरह का हुनर हर हाल में उसके भीतर से निकालकर दुनिया के सामने रखना चाहता है। हीरोइन अपना जलवेदार जिस्म जोश के साथ दिखाकर जहां खड़ी है, उससे आगे बढ़ना चाहती है। हीरो हमारा हर हाल में सिनेमा में छा जाना चाहता है। और दर्शक तो बना ही सब कुछ देखने के लिए है। वह तो वह भी देखना चाहता है, जो कि वर्जित सा है। निर्माता, निर्देशक और कलाकार सब कुछ दिखाना चाहते हैं, दर्शक देखना चाहता है, लेकिन सेंसर है कि अडंगा लगाने से नहीं चूकता। दर्शक का कहना है कि सैंसर मजा किरकिरा कर देता है, इसीलिए कुछेक निर्माताओं का तो यहां तक कहना है कि सेंसर बोर्ड की जरूरत ही क्या है। वैसे भी, जिसे जो देखना होता है, वह तो, कोई भी, कहीं भी, कभी भी, किसी भी कीमत पर देख ही लेता है। तो फिर सिनेमा पर सेंसर की केंची क्यों।
असल बात यह है कि सेंसर बोर्ड की नीतियां और उसके नियम ही कुछ ऐसे है जिनके जरिए किसी भी फ़िल्म को रिलीज़ होने से रोका जा सकता है और किसी भी फ़िल्म को सीधे पास किया जा सकता है। सेंसर बोर्ड की यह गाइडलाइन बाबा आदम के जमाने की है। इसलिए वह किसी भी सहज से दृश्य पर भी ऊंगली उठा सकते हैं। मामूली से मतवाले दृश्य को भी फिल्म में रखे रहने पर उसे ‘ए’ या ‘यूए’ सर्टिफिकेट दे सकते हैं। वैसे, आजकल किसी फिल्म को ‘ए’ सर्टिफिकेट मिलना उसकी सफलता की गारंटी माना जाता है। क्योंकि जिस फिल्म के पोस्टर पर ‘ए’ लिखा होगा, उसके बारे में दर्शक को लगता है कि कुछ तो है, जिसे देखा जाना चाहिए। फिल्म निर्माता महेश भट्ट मानते हैं कि उल्टे जब सेंसर के कट की वजह से कोई गीत, कोई दृश्य या कोई फ़िल्म चर्चा में आती है, तो दर्शक की रुचि उसमें कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। भट्ट इसे यह चूहे-बिल्ली का खेल मानते हैं। उनका मानना है कि सेंसर का कोई बहुत खास तुक नहीं रह गया है, उल्टे वह आपत्ति करके दर्शक को उस फिल्म को देखने को प्रेरित करता है। जाने माने फिल्मकार श्याम बेनेगल तो हमेशा से ही सेंसर विरोधी रहे हैं। बेनेगल मानते हैं कि समाज जानता है कि उसे क्या देखना चाहिए और क्या नहीं देखना, क्योंकि हर समाज में ख़ुद की ग़लतियों को ठीक करने का तंत्र होता है। लेकिन फिल्म प्रमाणन बोर्ड की स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य एवं मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार विजयसिंह कौशिक मानते हैं कि जीवन के हर पहलू में नियंत्रण रेखा है, तो फिर फिल्मों को कैसे छुट्टा छोड़ा जा सकता है। विजयसिंह कौशिक दूसरी बार फिल्म स्क्रीनिंग कमेटी में सदस्य हैं और मानते हैं कि सिनेमा वैसे भी समाज में हमेशा से नैतिक मूल्यों की बरबादी के आरोप झेलता रहा है। ऐसे में सब कुछ दिखाने की छूट तो समाज को और बरबादी की राह पर धकेल देगी।
वैसे सैंसर बोर्ड ही आखरी अदालत नहीं है। बीते साल की बात करें, तो डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम रहीम की फ़िल्म ‘मैसेंजर ऑफ़ गॉड’ पर सेंसर की कैंची के खिलाफ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन एपीलेट ट्रिब्यूनल में की गई। अपील में इस फिल्म को मंज़ूरी मिल गई, तो सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष लीला सेमसन रूठकर इस्तीफ़ा देकर घर बैठ गई थीं। दरअसल सेंसर बोर्ड के अलावा अलग – अलग धार्मिक गुटों, राज्य सरकारों और सामाजिक संस्थाओं द्वारा फ़िल्म पर की जाने वाली आपत्तियां भी सिनेमा बनानेवालों के लिए कई तरह की मुश्किलें खड़ी करते रहे है। वैसे, सेंसर बोर्ड अगर किसी फिल्म को पास कर भी दे, तो भी अगर कोई भी एक जाति, समाज या वर्ग नाराज़ हो जाए तो उस फिल्म का चलना तो दूर, सिनेमा हॉल तक उसका पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है। जबकि किसी भी फिल्म में उसके किरदार की ताकत या कमजोरी उसकी जाति की वजह से भी होती है और अगर फ़िल्म में यही बात नहीं दिखाई जाएगी, तो कहानी का मूल क्या रह जाएगा ?
सैंसर बोर्ड के बहुत ताकतवर होने का बावजूद वह अंततः कानून के सामने लाचार ही है। शायद इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट कई बार कहता रहा है कि फिल्मों के मामले में सेंसर बोर्ड का फैसला ही आखरी फैसला होना चाहिए। भले ही सेंसर बोर्ड का आदेश वाकई में आखिरी आदेश नहीं माना जाता। लेकिन फ़िल्मों के मामले में सबसे ताकतवर समझी जाने वाली संस्था असल में कोई बहुत ताकतवर न होने के बावजूद बहुत दमख़म रखती है। महेश भट्ट व श्याम बैनेगल जैसे जाने माने निर्माताओं का गुस्सा साफ गवाह है कि सैंसर की कैंची बहुत ज्यादा धारदार है और फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी। लेकिन विजय सिंह कौशिक की फिल्मों की वजह से भ्रष्ट होते सामाजिक सरोकारों की चिंता भी उनसे ज्यादा वाजिब नहीं है। स्वरा भास्कर और विद्या बालन की ताजा तकलीफ कोई यूं ही नहीं है।

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