फिल्म नई, पर गीत पुराने

फिल्म नई, पर गीत पुराने

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-साक्षी त्रिपाठी-
नई फिल्मों में पुराने गीत परोसे जा रहे हैं। तम्मा तम्मा से लेकर चीज बड़ी है मस्त और लैला में लैला जैसे बहुत सारे गीत फिर से बजने लगे हैं। कोई इसे सृजनशीलता की कमी बताता है, तो कोई नए जमाने की, नई पीढ़ी की नई रीत। इस बार पेश है इसी पर खास रिपोर्ट –  
संगीत की महिमा अपरंपार है। किसी को इसे सुनकर सुकून मिलता है। तो कोई उसकी धुन की धमाल में जिंदगी के जश्न को जीता है। किसी को संगीत की तान में तैरकर सात समंदर पार कर के सुख का अहसास होता है। तो कोई गाने सुनकर अपनी जिंदगी के दर्द का दरिया को पार कर जाता है। संगीत है ही ऐसा कि बरसों – बरसों के लिए वह किसी की सांसों में सज जाता है। तो कोई किसी और की खुशी के लिए इसे अपनी जिंदगी में जमाता है। दरअसल, शब्द, धुन, सुर, ताल और लय आदि सारे मिलकर एक ऐसा गजब माहौल रचते हैं। जिसमें हर किसी को सुकून का साया देने का माद्दा होता है। संगीत कानों में रस घोलता है। गीत की धुन जेहन में बस जाती है और जब उसके बोल हर किसी के लबों पर तैरने लगते हैं, तो बस, उसी के साथ गीत और संगीत हमारी जिंदगी के साथ साथ चलने लगता है। उसमें से कुछ गीत जब जिंदगी के किसी पहलू में साये की तरह हमारे साथ चिपक जाते है, तो उस संगीत को बनानेवाले भी नए जमाने के लिहाज से उन गीतों का रूप बदल कर फिर उन्हें हमारे सामने पेश कर देते हैं। और उसके बाद तो वे गीत एक बार फिर से नए सिरे से हमारी जिंदगी के साथ चलने लगते है। हमारे सिनेमा के कई गीतों के साथ इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है।
हम देख रहे हैं कि ‘तू चीज बड़ी है मस्त मस्त’, ‘तुम्हें अपना बनाने का जुनून’, ‘नैनों में सपना’, ‘लैला मैं लैला ऐसी हूं लैला’,‘तम्मा – तम्मा लोगे तम्मा’, ‘सारा जमाना हसीनों का दीवाना’ जैसे बहुत सारे बरसों बरसों से बहुत लोकप्रिय गीत बरसों बाद एक बार फिर से रूप बदलकर हमारी जिंदगी के साथ चलने के लिए सजा दिए गए हैं। श्रोता उन्हें खूब सुन भी रहे हैं। लेकिन उसका यह भी मानना है कि पुराने गीतों की बदलकर पेश की गई इन नई धुनों में वो मजा नहीं है, जो पुराने गीतों में था। कला जगत के कुछ लोगों को लगता है कि सिनेमाई संगीत के संसार में सृजनशीलता का अकाल पड़ गया है, इसलिए पुराने गीतों को फिर से नए सुरों के साथ सजाया जा रहा है। लेकिन सिनेमा का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो पुराने गीतों को नई धुनों के साथ पेश करने को खुले दिल से स्वीकार कर रहा है। थोड़ा गहरे से देखें, तो पुरानी फिल्मों के गीतों को नए जमाने में, नए अंदाज में, नए संगीत के साथ, नए सिनेमा में, नए तरीके से सजाने का यह नया फंडा नई पीढ़ी को पसंद आ रहा है। लेकिन संगीत के कद्रदानों की नजर में यह संगीत की मौलिकता के साथ बलात्कार के जैसा है।
सन 1983 में आई जिंतेद्र और श्रीदेवी की सुपरहिट फिल्म ‘हिम्मतवाला’ में किशोर कुमार के गाए गीत ‘नैनों में सपना, सपनों में सजना, सजना पे दिल आ गया’ गीत को सन 2013 में बनी हिम्मतवाला की रीमेक में अजय देवगन और तमन्ना भाटिया पर फिल्माया गया। दोनों ने जितेंद्र और श्रीदेवी के किरदार को जीने का भरपूर प्रयास भी किया, लेकिन दुनिया के दिलों पर छाई पुराने‘नैनों में सपना’ गीत की छाप उतारकर वे अपनी छाप नहीं छोड़ सके। इसी तरह 80 के दशक में आई फिल्म ‘कुर्बानी’ में जीनत अमान पर फिल्माए गए ‘लैला में लैला’ गीत को हाल ही में आई शाहरुख खान की फिल्म ‘रईस’ में सनी लियोनी पर फिल्माया गया। हालांकि खुद जीनत अमान ने ‘रईस’ में सनी लियोनी को इस गीत में देखकर खुशी व्यक्त करते हुए कहा था कि सनी ने वास्तव में बहुत जबरदस्त काम किया है। लेकिन फिर भी दर्शकों ने पवनी पांडे के गाए ‘लैला में लैला’ को कोई बहुत पसंद नहीं किया। सन 1991 में आई संजय दत्त और पूजा भट्ट की आई ‘सड़क’ के गीत ‘तुम्हें अपना बनाने की कसम खाई है’ को फिर से नए रूप में जब दर्शकों ने ‘हेट स्टोरी – 3’ में सुना, तो दर्शकों ने गुनगुनाया तो सही, लेकिन फिर भी दिमाग से असल गीत को निकाल नहीं पाए। उदित नारायण और कविता कृष्णमूर्ति ने 90 के दशक में आई फिल्म ‘मोहरा’ के लिए धांसू गीत गाया था – ‘तू चीज बड़ी है मस्त मस्त’। इस गीत के गजब हिट होने के पीछे रवीना टंडन की आनंदित कर देनेवाली उन्मुक्त अदाओं पर मरते अक्षय कुमार का अदभुत अभिनय भी सबसे बड़ा कारण था। लेकिन अब ढाई दशक बाद एक बार नए सिरे से अब्बास मस्तान की फिल्म ‘मशीन’ में कियारा गुप्ता और मुस्तफा बर्मावाला पर इस गीत को फिल्माया गया है। माधुरी दीक्षित और संजय दत्त की 90 के दशक में आई फिल्म‘थानेदा’र के सुपरहिट गीत ‘तम्मा – तम्मा लोगे तम्मा’ हाल ही में आई ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ में वरुण धवन और आलिया भट्ट पर फिल्माया गया। इसी तरह सन 1981 में आई अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्म ‘याराना’ के सबसे लोकप्रिय गीत ‘सारा जमाना हसीनों का दीवाना’ को 2017 में आई फिल्म ‘काबिल’ में नए रंग रूप में फिर से पेश किया गया। रितिक रोशन और यामी गौतम पर फिल्माया यह गीत नए फ्लेवर में दर्शकों को पसंद आया, इसका कोई बहुत बढ़िया परिदृश्य प्रकट नहीं हुआ है।
अपने जमाने के सबसे सुरीले संगीतकार और दुनिया के दिलों में बस जानेवाला संगीत देनेवाले श्रवण राठौड़ मानते हैं कि जो हो रहा है, वह जमाने की रीत है। वे बताते हैं कि संगीत जुबां पर बाद में आता है, पहले दिल में बसता है। और दिल में वही बसता है, जो सुरीला होता है। इसीलिए पुराने गीतों को नए जमाने के हिसाब के नए रंगरूप में ढालकर फिर से पेश किया जा रहा है, तो इसमें उन पुराने गीतों की गरिमा भी खिल कर सामने आ रही है। लेकिन संगीत समीक्षक रविराज प्रणामी की राय में यह जो हो रहा है, वह ठीक नहीं हो रहा है। उनका मानना है कि जो हो रहा है, वह कोई श्रोता वर्ग की मांग नहीं है, लेकिन फिर भी पता नहीं क्यूं सिनेमा बनानेवाले पुराने गीतों की आत्मा के साथ अनाचार करके उन्हें भद्दे तरीके से पेश कर रहे हैं। वैसे, संगीत के कद्रदानों की चिंता का अपना अलग महत्व है। लेकिन जिस तरीके से सिनेमाई संगीत के संसार में पुराने गीतों को सजाने का सिलसिला चल पड़ा है, उसके हिसाब से आनेवाले दिनों में और भी कई पुराने गीत नई फिल्मों में आएंगे। मजा आए कि न आए, सुनते रहिएगा।

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