झगड़ा कुंबले-कोहली काः भारत ने ही हराया भारत को

झगड़ा कुंबले-कोहली काः भारत ने ही हराया भारत को

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– विष्णु गजानन पांडे –
चैम्पियन ट्राफी में भारत की हार के कारणों पर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है. खेल के मैदान में कोहली से हुई तमाम गलतियों के बावजूद यह माना जा रहा है कि पाकिस्तान ने जो टारगेट रखा था वह आसानी से हासिल किया जा सकता था.परंतु भारत के पराक्रमी बल्लेबाजों ने जो कमाल दिखाया उसने ढेर सारे प्रश्न खड़े कर दिये थे जिनके जवाब अब मिलने लगे हैं.कोच अनिल कुंबले और कप्तान विराट कोहली के बीच की अनबन इस हार के मूल में नजर आ रही है.कुंबले ने अपने थैंक्स गिव्हिंग ट्वीट में जो लिखा है उसने तो बीसीसीआई के टालू  कामकाज को उजागर किया है.
कुंबले ने लिखा है कि कोहली के साथ असहजता की बात उन्हें बीसीसीआई से पता चली. कुंबले ने लिखा, ‘मुझे बताया गया कि कप्तान को मेरी कार्यशैली को लेकर परेशानी है. यह जानकर मैं हैरान रह गया क्योंकि कप्तान और कोच की सीमाएं मुझे अच्छी तरह से पता हैं. हालांकि बीसीसीआई ने मेरे और कप्तान के बीच सुलह कराने की कोशिश की. लेकिन यह स्पष्ट था कि यह साझेदारी आगे नहीं चलने वाली थी. ऐसे में मैंने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा.’
टीम इंडिया में बरसों तक जमे रहे कुंबले  इतने भोले भाले तो नहीं  है कि  अंदरखानी क्या चल रहा है इसकी उनको जानकारी न हो.  मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक कोच कुंबले टीम इंडिया में अनुशासन के मामले मे काफी सख्त थे.  प्रैक्टिस के दौरान कई मौकों पर वह खिलाड़ियों को फटकार भी लगा चुके थे. खबरों के मुताबिक हालांकि उन्होंने कभी खुलकर नहीं कहा लेकिन वे कई दौरों पर वे टीम के खिलाड़ियों की गर्लफ्रेंड, पत्नियों के जाने के भी खिलाफ थे. कुल मिलाकर कुंबले का रवैय्या किसी सख्त हेडमास्टर जैसा था जो विराट को तो पसंद नहीं था और उनकी तरह कुछ और नामधारियों को भी नापसंद था.सफलता के लिए अनुशासन जरुरी है पर सफल व्यक्ति अनुशासन पसंद नहीं करते. वे अनुशासन भी अपनी मर्जी के हिसाब से चाहते हैं. रिपोर्टों के मुताबिक इसी वजह से चैम्यिपंस ट्रॉफ़ी से ठीक पहले कोहली ने भारतीय क्रिकेट बोर्ड की सीईओ राहुल जौहरी को एक एसएमएस कर दिया- ‘ही इज़ ओवरबियरिंग.’
इस संदेश के बाद विराट कोहली और अनिल कुंबले के मतभेद पाटने काफी कुछ किया गया .बोर्ड के कहने पर तेंदुलकर और सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों ने भी कोहली से बातचीत की. लेकिन कोहली इस बात पर जोर देते रहे कि कुंबले उनकी सीमाओं में दख़लंदाजी करते हैं. तमाम कोशिशों के बावजूद बात बनी नहीं. बीसीसीआई संसार का सबसे समझदार बोर्ड है.वह जानता है कि सफल रह चुके खिलाड़ी  और  सफलता जिसके कदम चूम रही हो उस खिलाड़ी की हैसियत में फर्क होता है. कुंबले बोर्ड को पैसा दिलवा चुके थे और  कोहली पैसा दिलवा रहे  हैं  इसलिए कमाऊ पूत के सामने बोर्ड का  झुकना लाजिमी था.  नतीजा वही हुआ कि कुंबले को  ड्रेसिंग रुम से बाहर जाना पड़ा.
आईपीएल कमिश्नर राजीव शुक्ला का कहना है कि बीसीसीआई ने कोहली और कुंबले के बीच मतभेद को हल करने की कोशिश की लेकिन वे योग्य समाधान खोजने में नाकाम रहे और कुंबले ने आगे बढ़ने का फैसला किया.क्रिकेट प्रशासकों के पैनल से इस्तीफ़ा देने वाले रामचंद्र गुहा ने भी अनिल कुंबले के मामले को लेकर सवाल उठाए थे कि समय रहते कोहली और कुंबले के मतभेदों को दूर करने की कोशिश क्यों नहीं हुई.
मीडिया में छन छन कर आ रही रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान के खिलाफ १८० रनों की शर्मनाक शिकस्त के बाद विराट कोहली ने तो पाकिस्तान की जमकर तारीफ की,लेकिन कुंबले ने मैच के बाद टीम के कई खिलाड़ियों को जबरदस्त डांट लगाई और साफ शब्दों में कहा कि हर किसी का खेल फाइनल में उम्मीद से कम स्तर का था. अनिल कुंबले ने टीम के गेंदबाजों की भी खिंचाई की और उन्हें चेताया कि टीम में बने रहने के लिए ऐसा प्रदर्शन काम नहीं आएगा. कुंबले इस बात से भी नाराज थे कि खिलाड़ियों के चेहरे पर हार का दुख बिल्कुल भी नहीं था और वह मैदान पर पाकिस्तान के खिलाड़ियों के साथ हंसी मजाक कर रहे थे.कुंबले की सारी बात सच थीं लेकिन ये बातें कोहली को पसंद नहीं थी क्योंकि कोहली का मानना था कि खिलाडियों ने कोशिश तो पूरी की थी पर उस दिन पाकिस्तान की टीम हर लिहाज से बेहतर थी. पर कोहली की इस दलील को मानने के लिए कुंबले तैयार नहीं थे.शायद यही  बात कुंबले की रवानगी की अंतिम वजह बना.टीवी पर मैच देखने वाले इस बात को समझ रहे हैं कि उस दिन टीम इंडिया की ओर से सौ प्रतिशत प्रयास नहीं किया गया.
कुंबले की रवानगी भारतीय क्रिकेट के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं और पुराने खिलाडिय़ों ने इस बात पर नाराजी जाहिर की है. सुनील गावस्कर ने कहा कि ‘मुझे बहुत बुरा लगा कि अनिल कुंबले ने यह कदम उठाया. अगर आप अनिल कुंबले के कोच बनने के बाद से भारतीय टीम के प्रदर्शन पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि उनके खेल में जबर्दस्त सुधार हुआ. उन्होंने विषम परिस्थितियों में काम करते हुए टीम को मजबूत किया ठीक वैसे ही जैसे वह अपने समय में खेल के मैदान पर अंतिम समय तक संघर्ष किया करते थे. यही वह चीज थी जो भारतीय टीम में दिखाई दी.’  नाराज गावस्कर का कहना है कि ‘खिलाड़ी कभी यह नहीं कह सकते कि मुझे ये कोच चाहिए. खिलाड़ियों की मांग गलत है. खिलाड़ियों को अनुशासन में होना चाहिए. कोच खिलाड़ियों को मैच के लिए तैयार करता है. जिस तरह से भारतीय टीम ने पिछले एक साल से प्रदर्शन किया है, उसे लेकर सवाल नहीं उठाया जा सकता.इतिहास दिखाता है कि जब भी कोच ने सख्ती बरती, उसके साथ अनबन की खबरें जरूर मीडिया में छाई रहीं. जब कोई सफल होता है तो कोच के सामने कठिनाइयां खड़ी कर दी जाती हैं.’
एक टीवी चैनल से बातचीत में पूर्व खिलाड़ी मदनलाल ने कुंबले के पद छोड़ने को सही ठहराते हुए कहा है कि ‘टीम इंडिया कुंबले जैसे कोच के लायक ही नहीं है. टीम को संजय बांगड़ जैसे कोच चाहिए जो मुंह ही न खोलें. कुंबले का अगर टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम में स्वागत नहीं किया जाता तो उन्हें कोच पद पर रहने की जरूरत ही नहीं है. टीम इंडिया में कभी भी ऐसे कोच को पसंद नहीं किया जाता जो अपनी स्वतंत्र राय रखता हो या कप्तान से अलग सोचता हो.’

इसी संदर्भ में भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने ट्वीट किया है कि मेरे सबसे बड़े गुरु मेरे कोच थे. मैं उनसे नफरत करता था, लेकिन उसके बावजूद भी मैं उनके साथ २० साल तक रहा. वह हमेशा वो बात कहते थे, जो मैं नहीं सुनना चाहता था. उन्होंने यह नहीं लिखा है कि उनके कोच क्या कहते थे पर समझदार लोग जान ही गये होंगे कि वे अनुशासन और नियमित प्रेक्टिस के लिए ही डांटा करते होंगे जो किसी को पसंद नही आता.
मीडिया रिपोर्टो के अनुसार अनिल कुंबले के इस्तीफे की रूपरेखा २५ मार्च, २०१७ से बननी शुरू हो गई थी.उस वक्त धर्मशाला में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सिरीज़ के चौथे टेस्ट के लिए विराट कोहली कंधे की चोट की वजह से उपलब्ध नहीं थे.
अजिंक्य रहाणे टीम के कप्तान थे,  और सवाल यह था कि कोहली की जगह  किसे शामिल किया जाए. कोहली का मत था  कि टीम में उनकी जगह कोई बल्लेबाज़ खेले लेकिन कुंबले अतिरिक्त गेंदबाज़ कुलदीप यादव को मौका देने की राय रखते थे.कुंबले ने रहाणे से कह कर कुलदीप को मौका दिलाया. कुलदीप ने पहली पारी में चार विकेट लिये लेकिन दूसरी पारी में उन्हें कोई सफलता नहीं मिली. फिर भी टीम इंडिया ये मुक़ाबला आठ विकेट से जीत गई.
मैच के बाद कोहली ने मीडिया से कहा, “जिंक्स (रहाणे का निक नेम) और अनिल भाई पांचवें गेंदबाज़ को मौका देना चाहते थे और ये एक शानदार फैसला रहा. कुलदीप ‘एक्स फैक्टर’ साबित हुए.” मतलब उस समय कोहली की बात नहीं मानी गयी जो उन्हें बुरी लगी.
तो खटास लंबे समय से पड़ी थी,नतीजा अब सामने आया.यानी पीछे मुडक़र देखें तो यही लगता है कि चैंपियन ट्राफी का मुकाबला पूरी लगन के साथ नहीं खेला गया. पाकिस्तान के स्कोर का  भारत पीछा कर सकता था लेकिन या तो अतिआत्मविश्वास उन्हें ले डूबा या भारतीय बल्लेबाजों ने उस डेडिकेशन के साथ खेल नहीं खेला जैसा होना चाहिए था. उस दिन सारे बल्लेबाज ऐसा खेल रहे थे मानों उन्होंने कभी बल्ला पकड़ा ही न हो.आमिर के पहले स्पेल को निकाल लिया जाता तो मैच निकाला जा सकता था. बीस-पचीस रन से हार होती तो उसे समझा जा सकता था लेकिन बिना खेले हार जाने को हजम कर पाना मुश्किल हो रहा है . पाकिस्तान की टीम भारत से उन्नीस ही थी और वह शायद भारत को हरा भी नहीं पाती यदि टीम इंडिया हारने के लिए न खेलती.
कोहली और उनके साथियों के लिए यह कहा जा सकता है कि उन लोगों पर धन तभी तक बरसता रहेगा जब तक वे जीतते रहेंगे. जीतने के लिए अनुशासन और नियमित अभ्यास जरुरी है. जो लोग इस नियम को नहीं मानेंगे वे अपनी चमक खो देंगे.कामयाबी सिर पर चढ़ेगी तो सिर उतारकर ही दम लेगी.

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