राजस्थान में कांग्रेस का हाल और गहलोत का राजनीतिक कद !

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    -निरंजन परिहार-
    अशोक गहलोत मुख्यमंत्री भले ही राजस्थान के रहे हों, लेकिन इन दिनों वे गुजरात कांग्रेस के प्रभारी हैं और अखिल भारतीय कांग्रेस के महासचिव भी। हालांकि, आजकल वे राजस्थान में कम है। गुजरात में है या दिल्ली में। लेकिन असल बात यह है कि राजस्थान की कांग्रेसी राजनीति में फिर भी गहलोत के सामने बाकी सारे कांग्रेसी नेता बौने दिखाई दे रहे है। फिर, यही घोषित तथ्य और सार्वजनिक सत्य भी यही है कि गहलोत को आगे करके ही राजस्थान में कांग्रेस की सीटें बढ़ाई जा सकती है। वैसे देखा जाए, तो बहुत लंबे समय पहले से चुनाव की तैयारियों से लोग तो क्या पूरी की पूरी पार्टियां तक थक जाती हैं। लेकिन फिर भी राजस्थान के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि विधानसभा चुनाव की तैयारियां डेढ़ साल पहले से ही खुले आम शुरू हो गई है।
    मगर, इस बात का क्या किया जाए कि समूचे राजस्थान को बहुत तेजी से यह याद आ रहा है कि अशोक गहलोत के राज में प्रदेश में बहुत बढ़िया काम हुए थे। भले ही कांग्रेस की उनकी पिछली सरकार में राजनीतिक रूप से कोई भी मंत्री बहुत ताकतवर नहीं था। सरकार भी लंगड़ी थी लेकिन उधार के बहुमत क आधार बनाकर सरकार को स्थायी बनाने का करिश्मा भी गहलोत ने किया और सरकार भी बहुत शान से चलाई। काम तो अच्छा किया ही, लोगों के दिलों में भी जगह बनाई। इस सबके बावजूद मोदी लहर में उनकी सरकार बह गई। लेकिन राजस्थान की जनता को अब समझ में आ गया है कि गहलोत का नेतृत्व हो, तो ही राजस्थान में कांग्रेस फिर से मजबूत हो सकती है।
    दरअसल, गहलोत के राजनीतिक कद और उनके सामाजिक सम्मान ने कब उन्हें विराट राजनीतिक रूप बख्श दिया, यह किसी और को समझ में ही नहीं आया। पर निश्चित रूप से गहलोत शुरू से ही समझ रहे थे। इसीलिए, शुरू से ही नैतिकता और चरित्र के मामले में औने-पौने कद के बौने लोगों को अपने से दूर ही रखा। और जो नजदीकियों का लाभ पा भी गए, वे अपने करमों से दूर हो गए। उफान मारती नदी वैसे भी लाशों को कहां अपने साथ रखती है, वह तो उन्हें किनारे फैंक देती है, और आगे बढ़ जाती है। इसी कारण आज राजस्थान की कांग्रेस की राजनीति में गहलोत पूरे प्रदेश में हैं, बाकी लोग सिर्फ अपने इलाके में हैं और सचिन पायलट तो अपने गृह चुनाव क्षेत्र अदमेर में बी उखड़ गए हैं। राजनीति में कद इसी तरह से तय होते है। पर, सचिन पायलट तीन साल से राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष होने के बावजूद राजनीति के इसी सुर को समझने से चूक गए।
    राजनीति में किसको, कब, कहां, कैसे, किसके जरिए, किस तरीके सा साधना है, यह अशोक गहलोत बखूबी जानते हैं। और गहलोत यह सब बहुत आसानी से कर भी लेते हैं। क्योंकि राजनीति में उनकी साख बहुत मजबूत है। वे राजनीति के छल से दूर हैं और कपट तो उनके चरित्र में ही नहीं आ पाया। पूरे प्रदेश के लोगों के मन में इसी कारण उनके प्रति सम्मान बहुत ज्यादा है। बीजेपी के नेता भी मानते हैं कि एक जमाने में स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत को समूचे प्रदेश में जो राजनीतिक सम्मान हासिल था, वही राजनीतिक कद अब गहलोत को प्राप्त है। दरअसल, अशोक गहलोत राजनीति के सारे भंवर, प्रपात और प्रवाह बहुत पहले ही पार कर चुके हैं। सही कहा जाए, तो अपनी मेहनत, हिम्मत, ताकत और ईमानदार कोशिशों से गहलोत ने अपने जिस निजी माहौल का निर्माण किया, उसने राजस्थान में ही नहीं, बल्कि देश में भी उनकी भविष्य की राजनीति को सुरक्षित कर दिया है। फिर भी कभी कभी कुछ लोग गहलोत के अत्यंत ऊंचे राजनीतिक कद से सचिन पायलट की तुलना कर डालते हैं। हालांकि समझ में आने पर बाद में वे लोग ही इसे एक तरह की राजनीतिक नासमझी भी करार देते है।
    हालांकि राजस्थान तो मानता ही है, देश भर में भी माना जाता है और दिल्ली में भी सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी तक सारे केंद्रीय नेताओं को अच्छी तरह से पता है कि राजस्थान में कांग्रेस की नैया के असली खिवैया सिर्फ और सिर्फ अशोक गहलोत ही हो सकते हैं। फिर भी सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस की कमान सौंपकर कांग्रेस क्या समझदारी दिखाना चाहती है, यह अपनी समझ से परे है। क्या आपको समझ में आता है ?
    (लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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