राजपूती शान बढ़ाई है भन्साली की ‘पद्मावत’ ने

राजपूती शान बढ़ाई है भन्साली की ‘पद्मावत’ ने

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-निरंजन परिहार-
दिल्ली में जब गणतंत्र दिवस की परेड चल रही थी, उस वक्त अपन ‘पद्मावत’ देख रहे थे। इसलिए, सबसे पहले तो यह घोषणा कि ना तो अपन फिल्मों के कोई बहुत बड़े समर्थक है और ना ही ‘पद्मावत’ की पद्मावती के जौहर की आग में झुलसे संजय लीला भंसाली से अपनी कोई सहानुभूति। लेकिन फिर भी आप सब से आग्रह है कि ‘पद्मावत’ जरूर देखिये।
यह केवल हमारे हिंदुस्तान में ही हो सकता है कि बिना फिल्म देखे, झुंड के झुंड उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने के लिए मारने मारने पर उतर जाते हैं। आंदोलन करते हैं, प्रदर्शन करते है, गाडियां जलाते हैं, बाजार बंद करते हैं। और सरकारें हैं कि प्रतिबंध भी लगा देती है। गणतंत्र दिवस पर अपन ने ‘पद्मावत’ देखी। डर के साये में नहीं, बल्कि पूरे राजस्थानी ठाट से। इस फिल्म में राजपूती शान, गर्व, गौरव, गरिमा, प्रणप्रियता, आदर्श, परंपरा, संस्कार, स्वाभिमान और इसके अलावा भी शासक कौम की हर आन और बान को सम्पूर्ण सम्मान के साथ पेश किया गया है। खासकर राजपूतों की मर्यादा और उनके जुबान के पक्के होने को बहुत ही गौरवपूर्ण अंदाज में दर्शाया गया है। पता नही फिर भी इस फ़िल्म के विरोध में इतना उबाल क्यों है।
फिल्म में खिलजी और पद्मावती का तो एक भी दृश्य साथ में नहीं है। फिर राणा रतन सिंह को जितना आदर्शवादी बताया गया है, उसके उलट खिलजी को उसके असल चरित्र यानी बहुत ही बुरे चरित्र का दिखाया गया है। यहां तक की फिल्म में खिलजी की बीवी मेहरुन्निसा को भी पद्मावती की मददगार दिखाया गया है।
इसीलिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि फिल्म में राजस्थानी संस्कृति, संस्कार, और सामाजिक सम्मान एवं शान के खिलाफ जब कुछ है ही नहीं, तब भी विरोध क्यों है? मेरा आग्रह है कि राजनीतिक षडयंत्र से बाहर निकल कर, अपने आंखों पर बंधी विरोध की पट्टी उतारिये और एक बार ही सही, जरा पद्मावती को देख आइए। बाहर निकलेंगे, तो आप अपने सीने को भी राजपूती शान से कुछ और चौड़ा होता महसूस करेंगे, जैसे अपन कर रहे है। बुरा मत लगाना, मगर राजनीतिक हथकंडों को समझिए, उसका हिस्सा मत बनिये और इस बात को थोड़ा गहरे से समझिए कि ‘पद्मावत’ के विरोध से तो हमारी राजपूती परंपरा के परखच्चे ही उड़ रहे हैं। पूरा राजस्थान और हर गांव गली की माटी और हर घर की बेटी तक ‘पद्मावत’ के घूमर नृत्य की ताल पर थिरक रही है, फिर इस विरोध का अर्थ क्या है? दिल पर हाथ रखकर यह सवाल अगर आप खुद से करेंगे, तो अंदर से आपकी धड़कने भी ‘पद्मावत’ के घूमर नृत्य के संगीत के सांसें लेती सुनाई देगी। नहीं लगे तो कहना!

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