जातियों की जकड़न में सिसकता सचिन का सपना

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    -निरंजन परिहार-
    राजस्थान की राजनीति उबाल पर है। विधानसभा चुनाव ने सबको सक्रिय कर दिया है। लेकिन जैसे जैसे चुनावी बिसात मजबूत होती जा रही है, कांग्रेस की ताकत, उस ताकत के तेवर, और उन तेवरों की तासीर भी सार्वजनिक होती जा रही है। कांग्रेस के बड़े नेता बौराए हुए हैं कि भाजपा को इस बार भचीड़ ठोककर वे सत्ता में आ रहे हैं। कार्यकर्ता मदमस्त है कि उसकी पार्टी की सरकार आनेवाली है। और दिल्ली स्थित दस जनपथ के दालान में इस बात के तथ्य तलाशे जा रहे हैं कि राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस के दिन कैसे बदले जा सकते हैं। लेकिन कांग्रेस की कमजोर तस्वीर को बहुत ताकतवर तेवर में प्रदर्शित करके नेताओं द्वारा सत्ता में लौटने की बात जिन वजहों को बताकर कही जा रही है, उनमें कितनी सच्चाई है, यह जानना जरूरी है। क्योंकि राजनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, उसके मायने वे नहीं होते, जो होने चाहिए। सो, तस्वीर कुछ और है और ताकत की तलाश कहीं और की जा रही है। असल बात यह है कि राजस्थान की राजनीति को वहां का सामाजिक गणित ही हमेशा से नियंत्रित करता रहा है और इस नियंत्रण के केंद्र में कुछ प्रमुख जातियों की ताकत हमेशा से धुरी बनी रही है। जाट, राजपूत, मीणा, गुर्जर, माली, ब्राह्मण और यादव हमेशा से राजस्थान की राजनीति को अपनी अपनी ताकत के तेवर दिखाकर प्रभावित करते रहे हैं। लेकिन इनमें से जाट, राजपूत, मीणा और गुर्जर जातियां मार्शल कौम के रूप में जानी जाती रही है। प्रदेश की आबादी में इन चारों जातियों की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी है, और पिछले चुनाव में वसुंधरा राजे इनमें से तीन जातियों राजपूत, जाट और गुर्जरों को साधने में सफल रही थीं। ये दबंग हैं और राजस्थान की राजनीति के इतिहास के पन्नों में इनकी राजनीतिक दबंगई के किस्से भी बहुत प्रमुखता से प्रकाशित हैं।

    बीजेपी में वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री हैं, और कांग्रेस में सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनने का सपने देख रहे हैं। कांग्रेस हवा बना रही है कि वसुंधरा राजे फिर से सीएम का विरोध बहुत ज्यादा है, सो फिर से सीएम नहीं बनेगी। इस विरोध को मजबूती देने के लिए मानवेंद्र सिंह जसोल को राहुल गांधी से हाथ मिलवाकर कांग्रेस अपनी पार्टी में ले आई हैं। उनके पिता जसवंत सिंह अभी भी बीजेपी में ही हैं, लेकिन शारीरिक कारणों से राजनीतिक रूप से लगभग अनुपस्थित हैं, मारवाड़ के राजपूतों में उनका बहुत बड़ा नाम है, लेकिन मानवेंद्र के कांग्रेस में जाने से मारवाड़ का राजपूत कांग्रेस से जुड़ जाएगा, यह मान लेना बहुत मुश्किल है। सन 1952 में हुए पहले चुनाव से ही राजपूत मतदाता कांग्रेस का कट्टर विरोधी रहा है और कांग्रेस के खिलाफ वोट करते हुए हमेशा से वह मूल रूप से बीजेपी का मतदाता रहा है। फिर राजपूतों को ढोल नगाड़े बजाकर अपने साथ जोड़ने की कोशिश में कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि राजस्थान में जाट और मीणा राजपूतों की कट्टर विरोधी जातियां रही हैं, वे इस नई मुहिम से कांग्रेस के प्रति क्या सोच रहे होंगे। सत्ता में लौटने के हल्ले के बीच कांग्रेस में हालात ‘एक को मनाओ, तो दूजा रूठ जाता है’, वाले बनते जा रहे हैं। सचिन पायलट की सीएम बनने की मंशा में अशोक गहलोत को राजनीतिक रूप से ठिकाने लगाने की उनकी उजागर होती कोशिशें कांग्रेस को वैसे भी पलीता लगा रही है। राजस्थान की राजनीति में ज्यादातर लोग जानते हैं कि जातियों का गणित कभी भी किसी भी पार्टी का अचानक गुड़ गोबर कर देता है। मगर, सचिन पायलट यह सच्चाई समझे तब न।

    राज्य की 200 सदस्यीय विधानसभा में हर बार राजपूत समुदाय से 15-17 विधायक निर्वाचित होते रहे हैं। वर्तमान विधानसभा में 27 राजपूत विधायक हैं, जिनमें से 24 बीजेपी के हैं। राज्य की कुल आबादी में राजपूतों की हिस्सेदारी करीब 7 से 8 प्रतिशत है और ये राज्य की 100 सीटों पर जीत – हार का निर्धारण करने में अहम भूमिका निभाते हैं। राजपूतों के अलावा राजस्थान में जाट और मीणा 7 – 7 प्रतिशत, गुर्जर 5 प्रतिशत और माली व ब्राह्मण 6 – 6 प्रतिशत हैं। यादव भी 4 प्रतिशत के करीब हैं। कांग्रेस को सबसे पहले यह गणित थोड़ा सा गहरे समझना होगा कि राजस्थान की राजनीति में राजपूतों की तरह जाट, मीणा और गुर्जर भी प्रभावशाली हैं। और यह भी कि इन सभी के बीच एक दूसरे पर वर्चस्व साबित करने की हमेशा होड़ भी से जबरदस्त रही है। यह होड़ पिछले कुछेक सालों में अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गई है। खासकर जाटों व राजपूतों की बीच और गुर्जरों व मीणाओं के बीच यह होड़ तनाव तक पहुंचती रही है। और यही तनाव राजस्थान की राजनीतिक धुरी को प्रभावित करता रहा है। जानकार मानते हैं कि इनमें से किसी भी एक जाति का कोई नेता जैसे ही मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद की तरफ आगे बढ़ने लगता है तो अपना प्रभाव घटने के डर से प्रतिद्वंदी जातियों के नेता उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। मीणा समाज के सबसे बड़े नेता किरोड़ीलाल मीणा के बीजेपी में शामिल हो जाने के बाद हालात ऐसे हो रहे हैं कि आनेवाले दिनों में कांग्रेस के बचे – कुछे मीणा नेता भी कांग्रेस से छिटक जाएंगे और गुर्जर नेता के रूप में आगे बढ़ रहे सचिन पायलट को सीएम बनाने की कोशिश अगर हुई, तो वे तत्काल विरोध में खड़े होते भी देर नहीं करेगें। क्योंकि मीणा हमेशा से गुर्जरों के खिलाफ रहे हैं। फिर जाट और राजपूत भी गुर्जर को सीएम बनते देखना पसंद नहीं कर सकते। क्योंकि वैसे भी राजनीतिक ताकत के मामले में राजस्थान में गुर्जर तो राजपूतों, जाटों, मीणाओं के बाद चौथे नंबर पर आते हैं। और कांग्रेस में ये सारे सीएम पद के लिए अशोक गहलोत के नाम पर तो सहमत हो सकते हैं, मगर सचिन पायलट को लेकर एकमत होंगे, इस सवाल का जवाब तो कोई बच्चा भी ना में ही देगा। उम्मीद है, आपका जवाब भी यही होगा!

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