आखिर कांग्रेस की बदहाली की चिंता किसको है ?

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    -निरंजन परिहार-

    कांग्रेस अपने सबसे दुर्गम दौर से गुजर रही है। राहुल गांधी एक अकेले पूरी पार्टी की उम्मीद थे। लेकिन वे भी अध्यक्ष पद छोड़ चुके हैं। कार्यसमिति के सामने इस्तीफ़ा सौंपने के लगभग दो महीने बीत जाने के बावजूद नए नेतृत्व का चुनाव नहीं हो पाया है। लगातार दूसरी बार लोकसभा चुनाव मे बुरी तरह हारने के बाद कांग्रेस को संसद में विपक्ष के नेता का पद भी हासिल नहीं हुआ। नेता निराश हैं, और कार्यकर्ता हत्तप्रभ होकर ताक रहा है कि आखिर हो क्या रहा है। असमंजस लगातार बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस की कई प्रदेश इकाइयों से भी पार्टी के लिए हर रोज बुरी ख़बरें आ रही हैं। कर्नाटक में उसके विधायक अपनी ही सरकार तोड़कर और पार्टी छोड़कर जा रहे हैं, तो जिस गोवा में वह बहुमत के बावजूद सरकार बनाने में असफल रही, वहां कांग्रेस के दो तिहाई विधायक एक रात अचानक पूरी पार्टी को ही अनाथ कर बीजेपी में प्रवेश कर गए। महाराष्ट्र विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता राधाकृष्ण विखे पाटील विपक्ष के नेता का पद छोड़कर बीजेपी की सरकार में मंत्री बन गए हैं। साथ ही कुछ और नेता भी उनकी राह पर चलने की मुद्रा में हैं। गुजरात में कांग्रेस को तिलांजली देकर कुछ विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया है। मध्य प्रदेश में भी मुख्यमंत्री कमलनाथ की ज्यादातर ताकत अपने साथी विधायकों को पटाने में ही जाया हो रही है, तो राजस्थान में तो खुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ही मुख्यमंत्री बनने की फिराक में अपनी ही पार्टी की सरकार को अस्थिर करने की जुगत में जुटे हुए हैं।

    कांग्रेस के लगातार इस तरह से रसातल में जाने के अपनी नजर में केवल दो ही कारण है। पहला तो यह कि चुनाव मे हार जीत तो लगी रहती है, लेकिन सबसे जरूरी है अपने कार्यकर्ता का मनोबल बनाए रखना। जिसमें उसके सारे नेता घोरअसफल रहे हैं। इसकी वजह राहुल गांधी स्वयं है, जिन्होंने एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर पार्टी को अकेला छोड़ दिया है, जहां से उनके बिना संगठन का मजबूत होना लगभग असंभव सा दिखता है। दूसरा, बीजेपी का अब तक का सबसे ताकतवर और मजबूत उभार, जिसके नेता नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सक्षम साये में कांग्रेस छोड़कर जानेवाले नेता अपना व अपनी संतानों का भविष्य सुरक्षित महसूस करने लगे हैं। इसीलिए तो छोड़ छोड़ कर जा रहे हैं। अतः जरूरत यह है कि कांग्रेस को तत्काल अपना नया अध्यक्ष चुनकर पार्टी को बचाने के प्रयास करने चाहिए। वरना नुकसान और बड़ा होगा, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। वैसे, आज जो हालात कर्नाटक के हैं, आनेवाले कुछ ही दिनों में मध्य प्रदेश में भी वैसे ही हालात देखने को मिल जाएं,  तो कोई आश्चर्य नहीं। क्योंकि  मध्य प्रदेश में कमलनाथ अत्यंत अल्प बहुमत की सरकार चला रहे हैं। आज जो हालात हैं, उनके अनुरूप कांग्रेस मध्य प्रदेश में सत्ता में तो हैं, लेकिन बीजेपी से मुक़ाबले का नैतिक संबल खोती जा रही है। क्योंकि उसके पदाधिकारी, नेता, और कार्यकर्ताओं में जो साहस होना चाहिए, वह गायब दिख रहा है। राजस्थान में भी सचिन पायलट की सीएम बनने की अतृप्त आकांक्षाओं के कारण कांग्रेस का कबाडा हो रहा है।

    राहुल गांधी केअध्यक्ष पद छोड़ने के तत्काल बाद किसी ने उनके समर्थन में इस्तीफा नहीं दिया। तो, दुखी होकर जब उन्होंने कुछ दिन बाद दुख व्यक्त किया कि उनके इस्तीफे के बाद किसी ने पद नहीं छोड़ा। तब जाकर पश्चिमी यूपी में हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए वहां के प्रभारी महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी इस्तीफ़ा दे दिया। फिर मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा ने भी मुंबई में हार पर इस्तीफ़ा दिया। लेकिन राजस्थान में सचिन पायलट तो अशोक गहलोत के नेतृत्ववाली सरकार में मंत्री भी हैं और कांग्रेस में एक व्यक्ति एक पद के सिद्दांत के बावजूद  पायलट दोनों प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर भी बने हुए  हैं। और इस्तीफा न देकर राहुल गांधी की भावनाओं का अपमान भी कर रहे हैं, तो  बाकियों का तो क्या ही कहना। ऐसे में सबसे पहले अपना एक मासूम सा सवाल है कि कांग्रेस की दुर्गति के लिए ज़िम्मेदार कौन है। और दूसरा यह सवाल भी कि क्या निकट भविष्य में इससे उबरने का कोई रास्ता नज़र आता है? अपना दावा है कि आप और हम जब तक इन दो सवालों के जवाब तलाशेंगे, कुछ और नेता कांग्रेसी पार्टी का दमन छोड़कर बीजेपी में समाहित हो चुके होंगे। क्योंकि सबकोअपने भविष्य की चिंता हैं, कांग्रेस की किसी को नहीं पड़ी। जी हां, किसी को नहीं। क्या आपको कांग्रेस की चिंता है ?

    (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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