हालत बहुत खराब होनेवाली है मोदी जी, जरा सोचिए!

हालत बहुत खराब होनेवाली है मोदी जी, जरा सोचिए!

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-निरंजन परिहार

कोरोना संकटकाल ने देश की अर्थव्यवस्था को बरबाद करके रख दिया है। कहने को कहा जा सकता है कि पूरी दुनिया की हालत खराब है, तो भारत की हालत भी खराब होनी ही थी। लेकिन आर्थिक मामलों में औरों का गम देखने से हम अपना गम भूल  नहीं सकते। हिंदुस्तानियों की जेब खाली है, लोग भुखमरी की कगार पर हैं, व्यापार ठप है और नौकरियां लगातार जा रही है। हालत तो बीते चार साल से , जब नोटबंदी हुई थी, तब से ही खराब है। लेकिन लॉकडाउन से बरबाद हुई आर्थिक स्थिति के असली नतीजे अभी सामने आने अभी बाकी हैं। हालांकि सरकारों में सभी की जन्म कुंडली देखने की दिव्य दृष्टि नीहित है, सो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार को पता है कि आनेवाला वक्त चिंता पैदा करने वाला  हैं। आप और हम तो किसी के भी कंधे पर सर रखकर रो सकते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री किसके कंधे पर सर रखें। परेशानी यह है कि देश की अर्थव्यवस्था की हालत खराब होने की वजह से आने वाले दिनों में सरकार की परेशानी बहुत ज्यादा बढ़ सकती है।

एचडीएफसी लिमिटेड के सीईओ केकी मिस्त्री भले ही कह रहे हों कि भारतीय अर्थव्यवस्था का बुरा वक्त पीछे छूट चुका है और दिसंबर 2020 यानी 2 महीने बाद से आर्थिक सुधार की गति तेज होने के आसार है। लेकिन ताजा आंकड़ों के मुताबिक केंद्र सरकार का कर्ज बहुत बढ़ गया है। सरकारी सूचनाएं बता रही हैं कि जून 2020 के अंत तक सरकार की देनदारी बढ़कर 101.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। ऐसे हालात में, मिस्त्री भले ही होंगे एचडीएफसी के सीईओ, लेकिन उनकी इस बात पर कौन भरोसा करेगा कि दिसंबर में विकास दर पिछले साल के मुकाबले बेहतर रह सकती है। दरअसल, आम आदमी को ये सारी बातें रत्ती भर भी समझ में नहीं आती। वह तो कमाई और खर्च का हिसाब जानता है। उसे बढ़ती, घटती, टूटती, बिखरती, गिरती, लंगड़ाती और लड़खड़ाती जीडीपी से कोई मतलब नहीं है। वैसे भी सामान्य लोगों को तो यह भी नहीं पता कि जीडीपी होती क्या है। जिस देश की आधी से ज्यादा जनसंख्या दो जून की रोटी के जुगाड़ में पूरा जनम खपा देती हो, उस देश में क्या तो जीडीपी और क्या उसका हिसाब।

वैसे भी, लाखों लोगों का धंधा बीते सात महीनों से पूरी तरह से बंद है, तो घर में कमाई कहां से आएगी। सरकार तिमाही के नतीजों का इंतजार करती है, लेकिन बाजार सात महीनों से ठप पड़े हैं। मार्च के बाद से ही लोगों के घरों में पैसा ही नहीं आ रहा है, नौकरियां खत्म हो रही है, तो नतीजे कोई आकाश से तो आएंगे नहीं, वे तो हमारी आंखों के सामने तैर रहे हैं।  हमारी दुर्गति को तिमाही के नतीजों वाले हिसाब किताब में बांधकर क्या करेंगे मोदीजी,  हम तो आपके सपनों के हिंदुस्तान के सामान्य लोग हैं, जो नौकरियां छूटने से सड़कों पर खड़े हैं। लेकिन फिर भी केकी मिस्त्री जैसे अर्थजगत के जानकार पता नहीं किस मकसद से उम्मीद बंधा रहे हैं कि कृषि के बाद सबसे ज्यादा रियल एस्टेट और अचल-सम्पत्ति के कारोबार में रोजगार के अवसर हैं। हम देख रहे हैं कि किसान बरबाद हो रहा है और नौकरियां छूटने से घर खरीदने की ताकत लोगों की खत्म हो चुकी है, तो क्या खाक बढ़ेगा रियल एस्टे ट! एचडीएफसी घर खरीदने के लिए लोन देनेवाली कंपनी है, इसलिए उसके सीईओ को लग सकता है कि वे लोन दे देंगे, तो घर बिक जाएंगे। लेकिन यह उनको समझ में क्यों नहीं आता कि लॉकडाउन में देश के 2 करोड़ 40 लाख लोगों की चलती नौकरी छूट गई, 22 करोड़ लोग बाकायदा सड़क पर आ गए, जिनकी नौकरी बची है वे आधी पगार पर काम करने को मजबूर हैं। ऐसे में लोग पेट पालने में भी परेशान रहे हैं, तो घर क्या खाक खरीदेंगे। कमाई ही नहीं है, तो लोन की किश्त कहां से भरेंगे। सीधी सी बात है कि किश्त भरने की ताकत नहीं है, तो घर कौन खरीदेगा।

इसीलिए, हे हमारे महान देश के विश्व आदर्श प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी,  आपके लिए सबसे परेशानी वाली बात यह है कि सरकार की देनदारी लगातार बढ़ती जा रही है और विदेशी मुद्रा भंडारण घटता जा रहा है। आप तो उसे ठीक करने का इंतजाम कीजिए। हम देख रहे हैं कि मामला संभलना मुश्किल हो रहा है। साल भर पहले जून 2019 के अंत में सरकार का कुल कर्ज 88.18 लाख करोड़ रुपये था। लेकिन इस साल 2020 में जून के अंत तक सरकार की देनदारी बढ़कर 101.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। फिर देश का विदेशी मुद्रा भंडार 35.3 करोड़ डॉलर घटकर 541.66 अरब डॉलर पर आ गया है। राज्यों का जीएसटी का हिस्सा भी केंद्र सरकार दे नहीं पा रही है, और अर्थ व्यवस्था चौपट है। ऐसे खतरनाक हालात है, और फिर भी एचडीएफसी के सीईओ केकी मिस्त्री दिसंबर 2020 में भारतीय अर्थव्यवस्था का बुरा वक्त खत्म होने के सपने दिखा रहे हैं, तो निश्चित रूप से या तो उनके पास कोई जादू की छड़ी है या फिर वे कोई धांसू आइडिया लेकर देवदूत की तरह पृथ्वी पर जन्मे हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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